PURANIC SUBJECT INDEX पुराण विषय अनुक्रमणिका

Puranic Subject Index

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चक्रवाक् देवीभागवत ११.१८ ( देवी मन्दिर की प्रदक्षिणा से चक्रवाक् का बृहद्रथ राजा बनना), ब्रह्माण्ड २.३.७.४५८( गरुड - पत्नी धृतराष्ट्री से उत्पन्न पक्षिगण में से एक), मत्स्य २१.९ (  मानसरोवर के सात चक्रवाकों का वर्णन), २२.४२( पितरों का प्रिय तीर्थस्थान), ११३.७६( उत्तरकुरु निवासियों की एकानुरक्तता की चक्रवाकों से उपमा), ११६.११( गङ्गा? के चक्रवाक रूपी अधरों का उल्लेख), मार्कण्डेय १५.२६ ( रेशम चुराने से चक्रवाक् की योनि प्राप्त करने का उल्लेख), हरिवंश १.२१.३० ( ब्रह्मदत्त राजा के पूर्व जन्म का वृत्तान्त), कथासरित् १२.५.४४ ( विद्युज्जिह्व यक्ष के कुबेर के शाप से चक्रवाक् बनने का कथन), १२.९.११ ( मन्दारवती से विवाह के इच्छुक ब्राह्मणकुमारों का चक्रवाक् व्रत लेना), महाभारत आश्वमेधिक ९२दाक्षिणात्य पृ.६३२६ ( श्रान्त विप्रों को विश्रान्ति देने से चक्रवाक युक्त यान द्वारा यात्रा करने का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण २.९८.५१( उर्वशी को सनत्सुजात ब्राह्मण द्वारा चक्रवाक् रहित चक्रवाकी होने का शाप), २.१००.६९( कृष्ण दर्शन हेतु तीर्थ भ्रमण करने वाली चक्रवाकी रूप बाली उर्वशी का माता लक्ष्मी से मिलन), ३.९२.८८ ( चक्रवाकी के कलह धर्म का उल्लेख ) । chakravaak

 

चक्रव्यूह अग्नि १२३.९ ( ग्रह चक्र का वर्णन), कथासरित् ८.५.३ ( श्रुतशर्मा - सेनापति दामोदर द्वारा चक्रव्यूह की रचना का उल्लेख ) । chakravyuuha

 

चक्रा वायु ४३.२५( भद्राश्व देश की नदियों में से एक ) ।

 

चक्रिणी ब्रह्माण्ड ३.४.१८.१५( चक्रिणी : ललिता देवी के २५ नामों में से एक),३.४.३६.९०( चक्रिणी : सर्वसंक्षोभ चक्र की देवियों में से एक ) ।

 

चक्री भविष्य १.५७.१३( चक्री हेतु सप्तधान्य बलि का उल्लेख), मत्स्य १९६.२३( एक आर्षेय प्रवर चक्री का उल्लेख), विष्णु ४.१३.२५( चक्रधारी कृष्ण का एक नाम ) ।

 

चक्षु पद्म १.४० ( मरुत नाम), ब्रह्म २.१००.१ / १७० ( चक्षु तीर्थ में मणिकुण्डल के चक्षुओं का गौतम द्वारा छेदन, पुन: प्राप्ति), ब्रह्मवैवर्त्त ३.४.३२ ( पुण्यक व्रत में चक्षु / नेत्र सौन्दर्य हेतु कृष्ण को नीलकमल अर्पण करने का विधान), ब्रह्माण्ड १.२.१६.२७( हिमालय से नि:सृत नदियों में से एक), १.२.१८.४१ ( प्रतीची गङ्गा का चक्षु नामोल्लेख), २.३.३.१९( तुषित देवों में से एक), ३.४.३५.४७( चक्षुष्मती : मार्तण्ड भैरव की ३ शक्तियों में से एक), ३.४.३६.१५( चक्षुष्मती : चिन्तामणि गृह में स्थित शक्तियों में से एक), भविष्य ३.४.२५.२४( ब्रह्मा की प्रधान भालाक्षि से वह्नि की उत्पत्ति का कथन), भागवत ४.१३.१५ ( ध्रुव के वंशज चक्षु का उल्लेख), ५.१७.५( गङ्गा के चक्षु आदि चार धाराओं में विभाजन का उल्लेख ; चक्षु नदी के माल्यवान् शिखर से गिर कर पश्चिम समुद्र में मिलने का उल्लेख), ८.५.७( चाक्षुष मनु - पिता), ९.२३.१( अनु के ३ पुत्रों में से एक), मत्स्य ४.४०( रिपुञ्जय व वीरिणी - पुत्र, चाक्षुष मनु - पिता), १७१.५२( मरुत्वती के मरुद्गण पुत्रों में से एक), वामन ५७.७३ ( यक्षों द्वारा कुमार को चक्षु गण देने का उल्लेख), वायु ६६.१८( तुषित देव गण में से एक), विष्णु ४.१८.१( अनु के ३ पुत्रों में से एक), विष्णुधर्मोत्तर १.२१५.५१( चक्षु नदी के उरभ्र वाहन का उल्लेख), २.८.४१( षोडशाक्ष पुरुष के लक्षण), शिव ५.१७.३१ ( चक्षु नदी का उल्लेख), स्कन्द ४.१.४२.१४ ( चक्षुओं में मातृमण्डल का स्थान), ५.३.१.१५ ( विद्वानों के तीन चक्षुओं श्रुति, स्मृति व पुराण का उल्लेख ); द्र. निर्वृतिचक्षु । chakshu

 

चक्षुष ब्रह्माण्ड १.२.३६.१०२( रिपु व बृहती के पुत्रों में से एक, वारुणी - पति, चाक्षुष मनु - पिता), २.३.७४.७१( बलि की दासी से उत्पन्न दीर्घतमा के २ पुत्रों में से एक), वायु ९९.७०/२.३७.७०( बलि की दासी से उत्पन्न दीर्घतमा के २ पुत्रों में से एक ) ; द्र. चाक्षुष chakshusha

 

चचाई स्कन्द ३.२.३९.६५ ( ब्राह्मण गोत्र की देवी चचाई का उल्लेख ) ।

 

चञ्चल गणेश २.९३.३६ ( चञ्चल असुर का स्वरूप, गणेश द्वारा वध), देवीभागवत ९.२२.६ (  शङ्खचूड - सेनानी चञ्चल का समीरण से युद्ध), नारद १.६६.१३४( मत्तवाह गणेश की शक्ति चञ्चला का उल्लेख), मत्स्य ११४.२६( चञ्चला : ऋष्यवान् पर्वत की नदियों में से एक),शिव २.५.३६.१० ( शङ्खचूड - सेनानी, समीरण से युद्ध ) । chanchala

 

चञ्चु ब्रह्म १.६.२६ ( हरित - पुत्र, विजय - पिता, हरिश्चन्द्र वंश), ब्रह्माण्ड २.३.६३.११७( हरित - पुत्र, विजय व सुदेव - पिता, त्रिशङ्कु वंश), वायु ८८.११९/२.२६.११९( हरित - पुत्र, विजय व सुदेव - पिता, त्रिशङ्कु वंश), विष्णु ४.३.२५( हरित - पुत्र, विजय व वसुदेव - पिता, त्रिशङ्कु वंश), शिव ०.३.२९ ( बिन्दुग व उसकी पत्नी चञ्चुला की दुष्टता का वर्णन ) । chanchu

 

चटक देवीभागवत ६.२२.६ ( चटक /कलविङ्क : विश्वरूप के सुरापान वाले मुख से उत्पत्ति), वामन ५७.७०( अंशुमान द्वारा चटक नामक गण कुमार को देने का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण ३.८५.१०९ ( वृषायन ऋषि द्वारा चटका के बराबर अपना मांस श्येन को देने की कथा), ४.६८ ( प्रसाद के बिखरे अन्नकण खाने से चटका को सद्गति प्राप्त होने का वर्णन ) । chataka

 

चटिका स्कन्द १.२.४०.८ ( माण्टि ऋषि की पत्नी चटिका द्वारा चार वर्ष तक कालभीति नामक पुत्र को गर्भ में धारण करने का वर्णन ) ।

 

चण्ड अग्नि ७६.५ ( चण्ड पूजन विधान का प्रसंग), ९७.५५ ( मन्दिर के बाहर ईशान कोण में चण्ड पूजन का उल्लेख), गणेश २.७६.१४ ( विष्णु व सिन्धु के युद्ध में चण्ड का वह्नि से युद्ध), गरुड ३.२४.७७(श्रीनिवास के दक्षिण द्वार पर चण्ड - प्रचण्ड की स्थिति), गर्ग ७.२२.४२ ( अर्जुन द्वारा कालयवन - पुत्र चण्ड के युद्ध में वध का वर्णन), नारद १.६६.११०( चण्डेश की शक्ति सरस्वती का उल्लेख), १.६७.१००( महेश्वर के उच्छिष्टभोजी के रूप में चण्डेश का नामोल्लेख), पद्म ६.१५४.२३ ( चण्ड नामक भिल्ल द्वारा शिव की अनायास पूजा, खड्गधार लिङ्ग की स्थापना का वर्णन), ६.१६७.२ ( चण्डेश्वर तीर्थ का माहात्म्य), ६.२२८.१३ ( चण्ड व प्रचण्ड की अयोध्या के पूर्व द्वार पर स्थिति), नारद १.६७.१०० ( उच्छिष्ट भोजी, सूर्य - पार्षद चूडांशु को इष्ट पूजनोपरान्त नैवेद्य देने का उल्लेख), १.९१.२०९ ( चण्डेश शिव के मन्त्र का विधान), ब्रह्मवैवर्त्त ३.१९.२६ ( प्रचण्ड सूर्य से गण्ड की रक्षा की प्रार्थना), ब्रह्माण्ड ३.४.१७.४( दण्डनाथा देवी के सेनानियों में से एक), ३.४.१९.७८( गेय चक्र के ६ठे पर्व पर ८ भैरवों में से एक), ३.४.२५.२८ ( भण्ड - सेनापति चण्डबाहु राक्षस का उल्लेख), ३.४.२४.५० ( विकटानन नामक चण्ड / भयानक मुर्गे का कथन), मत्स्य २.८ ( ७ प्रलयकारक मेघों में से एक), १५३.१९( ११ रुद्रों में से एक), वामन ५७.९४ ( ब्रह्मयोनि द्वारा कार्तिकेय को चण्डशिला गण देने का उल्लेख), वायु ४१.७३ ( नागपति चण्ड के विष्णु चक्र से चिह्नित सौ सिर होने का उल्लेख), ६९.११३/२.८.१०९( २ पिशाचों में से एक, स्वकन्या यक्ष को प्रदान करना ), वा.रामायण ६.२६.२९ ( सारण द्वारा रावण को चण्ड नामक वानर का परिचय देना), शिव २.२.३७.१३ ( दक्ष यज्ञ विध्वंस के अन्तर्गत चण्ड द्वारा पूषा के दांत उखाडने का उल्लेख), ५.८.१२ ( यम द्वारा चण्ड नामक दूत को राजाओं को नरकाग्नि में डालने की आज्ञा देने का वर्णन), ७.२.२४.२१( ईशान दिशा में चण्ड को निर्माल्य अर्पण का निर्देश), ७.२.२६.२८( वही), स्कन्द १.१.५.८५ ( अज्ञान में हर नामोच्चारण के कारण इन्द्रसेन नृप का मृत्यु के पश्चात् चण्ड नामक शिव - गण बनना), १.१.१७.२४६( चण्ड की पीठिका की प्रदक्षिणा न करने से इन्द्र को वृत्र से भय की प्राप्ति का कथन), १.१.३३ ( चण्ड नामक किरात द्वारा अनायास शिवरात्रि व्रत चीर्णन का प्रसंग), ३.१.७.८ (देवी द्वारा चण्ड का वध), ४.२.५३.१२४ ( काशी में चण्डेश्वर लिङ्ग में पापमुक्ति का संक्षिप्त माहात्म्य), ४.२.७४.५३ ( चण्डगण द्वारा काशी में वायव्य कोण की रक्षा), ५.१.१९.२ ( चण्ड - प्रचण्ड द्वारा शिव - पार्वती की अक्ष क्रीडा में विघ्न, पार्वती द्वारा हनन), ५.१.२५.८ ( कृष्ण अष्टमी को चण्डीश्वर की अर्चना का संक्षिप्त माहात्म्य), ५.३.१९८ ( शिवचण्ड तीर्थ में सभानन्दा शक्ति का उल्लेख), ५.३.२९.४४ ( चण्डहस्त लिङ्ग की स्थापना का उल्लेख), ६.३२.५९ ( सप्तर्षियों तथा चण्ड द्वारा हेमपूर्ण उदुम्बर प्राप्ति पर प्रतिक्रिया), ६.९५.७० ( चण्ड की सूर्य से तुलना), ७.१.४२.३ ( चण्ड द्वारा स्थापित चण्डीश पूजन का संक्षिप्त माहात्म्य : पुन: जन्म न पाना), ७.१.९४.३ ( चण्ड नामक गण द्वारा पूजित भैरव रुद्र का संक्षिप्त माहात्म्य : दर्शन से पापों का नाश), ७.१.२५५.४२ ( हेमपूर्ण उदुम्बर प्राप्ति व बिस चोरी पर चण्ड की प्रतिक्रिया), लक्ष्मीनारायण १.१७७.५२( दक्ष यज्ञ में नैर्ऋत के चण्ड से युद्ध का उल्लेख), १.५१६.७१( चण्ड - प्रचण्ड के ही लिङ्ग के प्रसाद/नैवेद्य भक्षण के अधिकारी होने का वृत्तान्त), कथासरित् १८.४.२५२ ( चण्डपुर नगर में देवस्वामी ब्राह्मण की कन्या कमललोचना का वर्णन ) ; द्र. नागचण्ड, प्रचण्ड । chanda

 

चण्डक पद्म ६.२०६, ६.२०९, ६.२११ ( नापित चोर चण्डक द्वारा मुकुन्द विप्र की हत्या, मृत्यु पश्चात् सर्प बनना, सर्प की मुक्ति की कथा), स्कन्द ३.३.१७.२४ ( चण्डक शबर द्वारा शिवपूजा के लिए चिता भस्म न मिलने पर पत्नी द्वारा अग्नि प्रवेश करने की कथा ) । chandaka

 

चण्ड - अग्नि ३२३.१० (चण्डकपालिनी मन्त्र का कथन), ब्रह्माण्ड १.२.२३.५६( चण्डमना : चन्द्रमा के रथ के १० अश्वों में से एक), ३.४.२१.७९( चण्डबाहु : भण्ड असुर के पुत्र सेनापतियों में से एक), ३.४.२१.८२( चण्डधर्म : भण्ड  असुर के पुत्र व सेनापतियों में से एक), ३.४.२८.४२( चण्डकाली : चण्डकाली के कोलाट दैत्य से युद्ध का उल्लेख), मत्स्य १८३.६४( चण्डघण्ट : वाराणसी की रक्षा करने वाले गणेश्वरों में से एक), २७३.१५( चण्डश्री : विजय - पुत्र, शान्तिकर्ण - पिता, १९ आन्ध्र देशीय राजाओं में से एक), वामन ५५.६७ ( देवी की जटा से उत्पन्न चण्डमारी देवी द्वारा चण्ड - मुण्ड को पकड कर लाने का वर्णन), कथासरित् ५.३.१७९ ( चण्डविक्रम - कन्या बिन्दुरेखा का दैत्य द्वारा हरण), ८.३.१०९ ( मोहिनी विद्या को एक ही बार प्रयोग कर सकने के कारण वेणु - दण्ड के रक्षक चण्ड - दण्ड द्वारा प्रभास आदि से पराजय मान लेने का कथन), ८.४.८० ( सूर्यप्रभ - सेनानी चण्डदत्त की कालकम्पन से युद्ध में पराजय का उल्लेख), १२.१४.३ ( ताम्रलिप्ति - राजा चण्डसेन द्वारा सेवक की सहायता को ऋण मानकर चुकाने का वर्णन), १२.३४.१६२, १९३, २०६, ३७२ ( चण्डप्रभ : राजा महेन्द्रादित्य व राजपुत्र सुन्दरसेन के ४ मन्त्रियों में से एक), १६.२.२८( उज्जयिनी के राजा चण्डमहासेन द्वारा अङ्गारक राक्षस को मारने का उल्लेख ) । chanda

 

चण्ड - मुण्ड देवीभागवत ५.२६( शुम्भ - सेनानी चण्ड - मुण्ड का कालिका देवी द्वारा वध), पद्म ६.१६.२९ ( शिव रूप धारी जालन्धर को चण्ड - मुण्ड द्वारा देवी की प्राप्ति के लिए लालायित करने का वर्णन), मार्कण्डेय ८२.४५/८५.४५ ( चण्ड - मुण्ड द्वारा शुम्भ - निशुम्भ को पार्वती प्राप्ति के लिए प्रेरित करने का वर्णन), ८३.१८ / ८६.१८ ( शुम्भ द्वारा चण्ड - मुण्ड को देवी को पकड लाने की आज्ञा का कथन), ८४.२५/८७.२५ ( चण्ड - मुण्ड का वध करने के कारण काली देवी के चामुण्डा नाम का कथन), वामन १९.१ ( चण्ड - मुण्ड द्वारा कात्यायनी देवी के सौन्दर्य दर्शन का वर्णन), ५५.८१ ( चामुण्डा द्वारा मस्तक पर चण्ड - मुण्ड के सिर का अलङ्कार पहनना), स्कन्द ५.३.९१.२ ( चण्ड - मुण्ड द्वारा सूर्य पूजा से वर प्राप्ति, चण्डादित्य तीर्थ का माहात्म्य : आधि - व्याधि रहित होना), लक्ष्मीनारायण १.१६६ ( शुम्भ की आज्ञा से देवी को लाने गए चण्ड - मुण्ड के वध का वर्णन ) । chanda - munda

 

चण्डवेग भागवत ४.२७.१३ ( गन्धर्वराज चण्डवेग द्वारा पुरञ्जन पुरी पर आक्रमण का उल्लेख), मत्स्य २२.२८( चण्डवेगा : पितरों को प्रिय नदियों में से एक), विष्णुधर्मोत्तर १.१६४ ( नयनसुन्दरी - पति चण्डवेग को तिल द्वादशी व्रत से राज्यत्व प्राप्ति ) ।

 

चण्डशर्मा स्कन्द ६.२५.४३( विष्णुपदी गङ्गा में स्नान से चण्डशर्मा द्वारा सुरापान पाप से मुक्त होने का कथन), ६.१६२.२१ ( चण्डशर्मा द्वारा सप्तमी व्रत करने का उल्लेख ) ।

 

चण्डसिंह कथासरित् १४.२.३८( विद्याधरों के स्वामी देवसिंह - पुत्र चण्डसिंह की माता द्वारा नरवाहनदत्त को साथ ले जाने का वर्णन), १४.३.३८ ( चण्डसिंह की माता धनवती द्वारा नरवाहनदत्त के साथ अपनी पुत्री अजिनावती का विवाह करना ) ।

 

चण्डा नारद १.६६.९१( शङ्खी विष्णु की शक्ति चण्डा का उल्लेख), पद्म १.६.५४ ( वृषपर्वा - पुत्री, शर्मिष्ठा - भगिनी), मत्स्य १७९.१६( शिव द्वारा सृष्ट मानस मातृकाओं में से एक), स्कन्द ६.३२.५९, ७.१.२५५.४२( ऋषियों की भृत्या चण्डा द्वारा राजा से प्रतिग्रह के विषय में प्रतिक्रिया), लक्ष्मीनारायण १.५६४.३७ ( चण्डवेगा नदी में स्नान से चन्द्रशर्मा की चाण्डालत्व से मुक्ति का प्रसंग ) । chandaa

 

चण्डाल अग्नि १५१.११ ( ब्राह्मणी स्त्री व शूद्र के संयोग से उत्पन्न सन्तान की चण्डाल संज्ञा होने का कथन), १५१.१४ ( चण्डाल द्वारा किए जाने वाले कार्यों का वर्णन), देवीभागवत ७.२३+ (हरिश्चन्द्र - विश्वामित्र की कथा), पद्म १.४८.१८ ( ब्राह्मणों को देवाग्नि न देने पर सैंकडों योनियों के पश्चात् चाण्डाल होने का उल्लेख), १.५०.२८० ( श्राद्ध में गोमांस भोजन कराने से चण्डालत्व का शाप प्राप्त करने वाले द्विजों का प्रसंग), २.१२ ( दुर्वासा के शाप से हरिश्चन्द्र के समय में धर्म के  चाण्डाल रूप में अवतार का वर्णन), मार्कण्डेय ८.८१ ( हरिश्चन्द्र उपाख्यान के अन्तर्गत धर्म का चण्डाल रूप धारण करना), स्कन्द २.४.२७.९ ( विष्णुदास ब्राह्मण का चाण्डाल द्वारा अन्न हरण होने व साक्षात् विष्णु भगवान द्वारा दर्शन देने का वर्णन), योगवासिष्ठ ३.१०६.४६ ( इन्द्रजालोपाख्यान के अन्तर्गत राजा लवण द्वारा क्षुधा से व्याकुल होकर चाण्डाली से विवाह आदि का वर्णन), ३.१२० ( राजा लवण तथा सन्तान से वियोग पर चाण्डाली के विलाप का वर्णन), लक्ष्मीनारायण १.२६१.१०३ ( चण्डाल द्वारा हरिमन्दिर में कीर्तन व एकादशी जागरण करने से मुक्ति का उपाय जानकर ब्रह्मराक्षस द्वारा भी व्रत, जागरण , कीर्तन करके मुक्त होने का वर्णन), १.५६४.३० ( शाण्डिल्य ऋषि की पत्नी को छूने से चन्द्रसेन राजा के चण्डाल होने का कथन), १.५१४.४७ ( घूककर्ण नामक चण्डाल - पुत्र द्वारा विवाहित विप्रकन्या की शुद्धि का वर्णन), ३.९१.१०२( क्रशाङ्ग व इन्द्र संवाद में चाण्डाल द्वारा अति तप से क्रमश: शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय व द्विज योनियों को प्राप्त करने का वृत्तान्त), कथासरित् ६.१.१२३ ( ब्राह्मण व चाण्डाल द्वारा साथ - साथ तपस्या करने पर शुद्ध - हृदय चण्डाल के राजगृह में जन्म होने का कथन), १०.५.२०४ ( मूर्खा चण्डाल - कन्या द्वारा अपनी जाति के चण्डाल को सबसे बडा मानकर पति बनाने की कथा ) । chandaala

 

चण्डिक वायु ९९.१०४/२.३७.१०४ ( राजा लोमपाद/चित्ररथ द्वारा चण्डिक हस्ती को पृथिवी पर लाने का उल्लेख? ) ।

 

चण्डिका अग्नि ५०.११ ( चण्डिका देवी की प्रतिमा के लक्षण), ५२.१६ ( चण्डिका देवी की प्रतिमा के लक्षण), ९१.१४( चण्डिका के बीज मन्त्र आं ह्रीं का उल्लेख), देवीभागवत २.२६.४८ ( नवरात्र में सात वर्षीया कन्या चण्डिका के पूजन से ऐश्वर्य व धन प्राप्ति का उल्लेख), ७.३०.७३ ( अमरकण्टक सिद्धपीठ में देवी का चण्डिका नाम होने का उल्लेख), ७.३८.१९ ( अमरेश में चण्डिका देवी की स्थिति का उल्लेख), पद्म ६.२०४ (पुत्रकामना से चण्डिका का पूजन करने वाले विष्णुशर्मा का वृत्तान्त), ब्रह्मवैवर्त्त ३.३७.१८ ( चण्डिका देवी से वायव्य दिशा की रक्षा की प्रार्थना), ब्रह्माण्ड ३.४.७.७२( चण्डिका आदि मातृकाओं के पूजन में मधु के प्रशस्त होने का उल्लेख), ३.४.४०.२५( पार्वती की सखियों में से एक), भविष्य १.५७.१५( चण्डिका हेतु सुचन्दन बलि का उल्लेख), ३.२.३.१४ ( मन्त्री वीरवर द्वारा चण्डिका को पुत्र की बलि देने पर राजा रूपसेन द्वारा अपनी बलि देना, देवी द्वारा सबको पुन: जीवित करने की कथा), भागवत ५.९.१४( चोरों द्वारा ब्राह्मण भरत को बांधकर चण्डिका के मन्दिर  में लाने आदि का कथन), १०.२.१२( यशोदा के गर्भ से जन्म लेने वाली योगमाया के नामों में से एक), मत्स्य १३.४३( मकरन्द तीर्थ में उमा की चण्डिका नाम से स्थिति का उल्लेख), १५८.१६( उमा का पर्यायवाची नाम), मार्कण्डेय ८७.१३ ( चण्डिका द्वारा शुम्भ से युद्ध का वर्णन), ८८.२८ (देवताओं द्वारा चण्डिका की स्तुति), वामन ५६.२ ( चण्डिका से उत्पन्न मातृकाओं द्वारा दैत्य सेना से युद्ध, चण्डिका द्वारा रक्त बीज के वध का वर्णन), स्कन्द ५.१.२०.१२ ( सिद्धेश्वर तीर्थ में चण्डिका दर्शन से सिद्धि प्राप्ति का उल्लेख), ५.३.१९८.८० ( देवी के १०८ नामों में चण्डिका का उल्लेख), ६.९५.१८ ( राजा अजापाल द्वारा चण्डिका की आराधना करने व मन्त्र - अस्त्र प्राप्त करने का वर्णन), ७.१.१८९ ( चण्डिका के कर्ममोटी देवीपीठ का संक्षिप्त माहात्म्य : सब कार्य सिद्ध होना), ७.३.३६.१४ ( महिषासुर वधार्थ चण्डिका की उत्पत्ति का वर्णन), ७.४.१७.२० ( द्वारका में दक्षिण द्वार पर चण्डिका देवी की स्थिति का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण १.४२४.१८( क्षुद्र के नाश हेतु चण्डिका का उल्लेख), कथासरित् २.२.१४१ ( भिल्लराज द्वारा श्रीदत्त को चण्डिका की बलि चढाने की तैयारी), ५.३.१४५ ( चण्डिका मन्दिर में बंधे हुए शक्तिदेव द्वारा चण्डिका की स्तुति करना), १२.२.११३ ( राजा पुष्कराक्ष द्वारा चण्डिका की स्तुति करना), १२.११.६९ ( वीरवर द्वारा चण्डिका को पुत्र की बलि चढाने का वर्णन), १५.१.७० ( शंकर द्वारा कैलास गुफा के उत्तर द्वार पर कालरात्रि, चण्डिका व अपराजिता को स्थापित करना ) । chandikaa

 

चण्डिल स्कन्द १.२.६४, १.२.६६ ( कौरव - पाण्डव युद्ध में अपने शर के आगे सिद्ध भस्म लेपन करने वाले तथा अकेले सारे शत्रुओं को मारने का दम्भ करने वाले चण्डिल का कृष्ण द्वारा शिरछेदन, बर्बरीक के शिर द्वारा युद्ध का दर्शन , केवल कृष्ण का दर्शन आदि ) । chandila

 

चण्डी अग्नि ५०.१ ( चण्डी प्रतिमा के लक्षणों का वर्णन), पद्म ६.१३३.२१ ( अमरकण्टक में चाण्डिक तीर्थ का उल्लेख), शिव २.३.४०.३५ ( चण्डी द्वारा रुद्र की बहिन बनकर बारात में आगे चलने का उल्लेख), ४.१३.३७ ( दधीचि - पुत्र सुदर्शन की चण्डी पूजन से मुक्ति का वर्णन), ७.२.२४.२१ ( शिव पूजन के पश्चात् चण्डी पूजन का उल्लेख), स्कन्द ४.२.७०.७० (शिखीचण्डी दर्शन से समस्त व्याधि नाश होने का उल्लेख), ४.२.७२.५८ ( चण्डी से कपोल युगल की रक्षा की प्रार्थना), ५.१.२५.८ ( चण्डीश्वर तीर्थ में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत करने से मुक्ति का उल्लेख), ५.१.३८.४ ( चण्डी द्वारा अन्धक का रक्त पीने से अन्धक का क्षय ), ६.८६.९ ( चन्द्रमा की २७ पत्नियों द्वारा पति प्राप्ति हेतु चण्डी की पूजा), ६.९५.१८ ( अजापाल राजा द्वारा चण्डी की आराधना, मन्त्र व अस्त्र प्राप्ति), ७.१.३४० ( चण्डीश्वर माहात्म्य : शिवलोक गमन), कथासरित् १०.५.१६०( व्यभिचारिणी पत्नी द्वारा ठगे गए ईर्ष्यालु नामक पुरुष द्वारा चण्डी की स्तुति करने व वरदान प्राप्त करने की कथा), १६.१.४५ ( विरह के कारण मृत शूरसेन व उसकी पत्नी को चण्डी द्वारा पुन: जीवित करने की कथा), १८.४.२४ ( कार्पटिक देवसेन की निर्भीकता पर चण्डी नामक यक्षिणी का प्रसन्न होकर लेप देने का वर्णन ) ; द्र. मङ्गलचण्डी, मूलचण्डीश । chandee/chandi

 

चण्डीश ब्रह्माण्ड ३.४.४४.५०( वर्णों के रुद्र देवताओं में से एक), भागवत ४.५.१७ ( दक्ष यज्ञ विध्वंस के वर्णन में शंकर पार्षद चण्डीश द्वारा पूषा को पकडने का उल्लेख), स्कन्द ७.१.३०८ ( मूलचण्डीश की कथा : ऋषि शाप से लिङ्ग पतन के पश्चात् लिङ्ग में शिव की स्थिति की कथा ) ।

 

चण्डोदरी वा.रामायण ५.२४.३८ ( राक्षसी , अशोक वाटिका में सीता को भय दिखाना ) ।

 

चतुरङ्ग मत्स्य ४८.९५( ऋष्यशृङ्ग की कृपा से दशरथ - पुत्र चतुरङ्ग के जन्म का उल्लेख, पृथुलाक्ष - पिता), विष्णु ४.१८.१८( रोमपाद - पुत्र, पृथुलाक्ष - पिता ) ।

 

चतुरस्र नारद १.२८.३३( श्राद्ध में ब्राह्मण हेतु चतुरस्र मण्डल के निर्माण का निर्देश ) ।

 

चतु:स्रोत वराह १४१.१७ ( हिमालय की चारों दिशाओं से धारा गिरने से चतु:स्रोत की प्रसिद्धि ) ।

 

चतुरिका कथासरित् १६.५.३ ( वेदपाठी मूर्ख ब्राह्मण द्वारा सांसारिक व्यवहार ज्ञान हेतु चतुरिका वेश्या के पास जाने का प्रसंग ) ।

 

चतु: - ब्रह्माण्ड ३.४.२१.८०( चतुर्गुप्त, चतु:शिरा, चतुर्बाहु : भण्ड असुर के पुत्र सेनापतियों के नाम), ३.४.२६.४७, ७२( चतुर्बाहु, चतु:शिरा : भण्ड के ३० पुत्रों में प्रमुख), ३.४.४४.६७( चतुर्मूर्ति : ५१ वर्णों के गणेशों में से एक), भागवत २.७.५( चतु:सन द्वारा ऋषियों को आत्मा के विस्मृत ज्ञान का उपदेश देने का उल्लेख), ५.२०.१५( चतुश्शृङ्ग : कुश द्वीप के वर्ष पर्वतों में से एक), मत्स्य २५४.१( चतु:शाल गृह की रचना का वर्णन ) ।

 

चतुर्थी अग्नि १७९ ( माघ शुक्ल चतुर्थी : गणेश पूजा का मन्त्र), गणेश २.४८.१५ ( माघ चतुर्थी को ढुण्ढि गणेश की पूजा व स्तोत्र), २.८२.१४ ( भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को सिन्धु वध हेतु षड्भुज गणेश का अवतार), गरुड १.११६.५ ( चतुर्थी को चतुर्व्यूह की पूजा का उल्लेख), १.१२९.१० ( माघ चतुर्थी को गणेश व्रत का कथन), नारद १.११३ (विभिन्न मासों की चतुर्थी तिथियों को गणेश की विभिन्न नामों से पूजा व व्रतों का वर्णन), पद्म १.२४.४३ (अङ्गारक चतुर्थी पूजा विधि), ५.३६.३८( पौष शुक्ल चतुर्थी को राम व विभीषण के मिलन का उल्लेख), ६.२४९.३७ ( भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्र दर्शन से कृष्ण को स्यमन्तक मणि की चोरी का मिथ्या कलङ्क लगने का उल्लेख), व्रñवैवर्त्त ४.८०.८ ( भाद्रपद चतुर्थी को चन्द्रमा द्वारा तारा के दर्शन, चेतना हीन होना आदि), भविष्य १.२२+ ( चतुर्थी व्रत का माहात्म्य : गणेश द्वारा विघ्न की कथा), १.३१ ( शिवा, सुखा, शान्ता चतुर्थी का वर्णन), मत्स्य ७२.१७ ( अङ्गारक चतुर्थी व्रत की विधि), विष्णुधर्मोत्तर ३.२२१.२८( चतुर्थी तिथि को पूजनीय देवताओं के नाम तथा फल), स्कन्द ५.१.३७.४४ ( अङ्गारक के महादेव - पुत्र होने की कथा, मङ्गलवार को चतुर्थी होने पर पुत्र प्राप्ति हेतु पूजा का उल्लेख), ५.३.२६.१०७ ( चतुर्थी के व्रत व विनायक पूजा से विघ्न न होने का उल्लेख), ६.१४२( माघ शुक्ल चतुर्थी को गणपति - त्रय पूजा का आख्यान), ६.२१४ ( माघ शुक्ल चतुर्थी को गणनाथ पूजा का विधान), ७.१.३४१ ( भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को आशापूर विघ्नराज पूजा का उल्लेख), ७.१.३४९( फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी को महाविनायक पूजा का वर्णन), ७.३.३२.२४ ( माघ शुक्ल चतुर्थी को महाविनायक पूजा का वर्णन), लक्ष्मीनारायण १.३११.६० ( पुरुषोत्तम मास की चतुर्थी के सब कामना पूरी करने वाली होने का कथन), १.२६९ ( १२ मासों में शुक्ल व कृष्ण पक्ष की चतुर्थियों के व्रतों का वर्णन), २.२८७.२ ( चतुर्थी पूजा का वर्णन), ३.१०३.४ ( चतुर्थी के दान से गोधन प्राप्त करने के फल का उल्लेख ) । chaturthi/chaturthee

 

चतुर्दन्त कथासरित् १०.६.३० ( हाथियों के झुण्ड के सरदार चतुर्दन्त का उल्लेख ) ।

 

चतुर्दश शिव ५.४.१० ( ८ देवयोनि, मानुषी नवमी व ५ तिरश्चीन योनियों का कुल योग १४ ) ।

 

चतुर्दशी अग्नि १९२ ( विभिन्न मासों में हरि पूजा, अनन्त चतुर्दशी व्रत), १९३ ( फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी : शिव रात्रि व्रत), कूर्म २.३९.६८ /२.४१.७१ ( वैशाख कृष्ण चतुर्दशी : शुक्ल तीर्थ में कपिला तीर्थ में स्नान आदि का कथन), २.३९.९४ / २.४१.१०० ( श्रावण कृष्ण चतुर्दशी : गणेश्वर तीर्थ में स्नान से रुद्रलोक में प्रतिष्ठित होने का उल्लेख), गरुड १.११६.७ ( चतुर्दशी को ब्रह्मा की पूजा), देवीभागवत ९.२६.४४ ( ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी : सावित्री पूजा), नारद १.१२३ (चतुर्दशी तिथि के व्रतों का वर्णन), २.४९.१८ ( मास अनुसार शिव नाम व पूजा), पद्म १.१९.२१ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : ज्येष्ठ पुष्कर में सरस्वती में स्नान), ३.१८.१६ ( कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी :अगस्त्येश्वर लिङ्ग की पूजा), ३.१९.२४ ( कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : शुक्ल तीर्थ में पूजा), ३.२५.३३ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : सरस्वती में स्नान), ४.२३.१२ ( कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को दधि सेवन का निर्देश), ५.३६.३१ ( मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी : हनुमान द्वारा लङ्का दहन), ६.१२२ ( कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : यम चतुर्दशी के कृत्य, स्नान, दीप दान आदि), ६.१२८.११७ ( पौष चतुर्दशी : लोमश का अच्छोदा सर में स्नान, पिशाच - पिशाचिनियों की मुक्ति की कथा),६.१५४.१७ ( माघ शुक्ल चतुर्दशी : चण्ड द्वारा शिव लिङ्ग की अनायास पूजा), ६.१७४.२८ ( वैशाख शुक्ल चतुर्दशी : नृसिंह व्रत), ब्रह्मवैवर्त्त २.२७.९९ ( ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी को सावित्री पूजा का संक्षिप्त माहात्म्य), ब्रह्माण्ड ३.४.२६.३३( चतुर्दशी तिथिमयी : ज्वालामालिनी देवी का नाम), मत्स्य ९५.५+ ( मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी : माहेश्वर व्रत, मास अनुसार शिव नाम व पुष्प), १९३.५ ( ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को कपिला गौ दान करने का उल्लेख), १९३.१५( श्रावण कृष्ण चतुर्दशी को गङ्गेश्वर में स्नान से शिवलोक जाने का उल्लेख), १९३.६५ ( भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी : एरण्डी तीर्थ में स्नान), वराह ३३.२९ (ब्रह्मा द्वारा चतुर्दशी को रुद्र की तिथि नियत करने का वर्णन), विष्णुधर्मोत्तर ३.१८५+ ( चतुर्दशी व्रत), ३.२२१.८५( चतुर्दशी को यक्ष, राक्षस, कुबेर, महादेव आदि की पूजा का निर्देश तथा फल), स्कन्द २.२.१६.६२ ( वैशाख चतुर्दशी : नृसिंह अवतार), २.२.२९.५० ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : दमनक पुष्पों द्वारा विष्णु पूजा), २.२.३८.११६( मधु शुक्ल चतुर्दशी को मत्स्यावतार द्वारा दमनक दैत्य का वध), २.४.३५ ( वैकुण्ठ चतुर्दशी), ४.२.५४.७७ ( मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी : पिशाचमोचन तीर्थ में स्नान), ४.२.६१.१०९ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : पशुपति तीर्थ की यात्रा), ४.२.६३.९ ( ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी : काशी में ज्येष्ठ स्थान की यात्रा), ( यम चतुर्दशी :दीप दान की महिमा), ५.२.२७.६१ ( आश्विन् चतुर्दशी :नरकेश्वर का माहात्म्य), ५.३.२६.१२५ ( चतुर्दशी को उपानह का दान), ५.३.६४.२ ( चतुर्दशी को उपानह, छत्र, घृत, कम्बल का दान), ५.३.७८.१७ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : शस्त्राहतों का श्राद्ध, छत्र दान), ५.३.१५०.४१ ( चैत्र चतुर्दशी को कुसुमेश्वर का माहात्म्य), ५.३.१५६.३ ( वैशाख कृष्ण चतुर्दशी : शुक्ल तीर्थ का माहात्म्य), ५.३.१५६.१८ ( कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को घृत, कम्बल, स्वर्ण दान), ५.३.१६७.१९ ( ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी : मार्कण्डेश्वर तीर्थ का माहात्म्य), ५.३.१७५.१३ ( ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी : कपिलेश्वर तीर्थ में स्नान), ५.३.१७९.१० ( आश्विन् कृष्ण चतुर्दशी : गौमतेश्वर में स्नान, सौ दीपों का दान), ५.३.१८५.२ ( चतुर्दशी को एरण्डी तीर्थ का माहात्म्य), ५.३.२०३.३ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : कोटि तीर्थ में स्नान), ५.३.२०९.१७६ ( कार्तिक चतुर्दशी : उपवास, भारभूति तीर्थ का माहात्म्य), ६.१४३ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : जाबालि, जाबालि - कन्या फलवती व चित्राङ्गद की कथा), ६.१५५ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : एकादश रुद्रों की शतरुद्रिय द्वारा पूजा), ६.१६१ (चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : माहिका द्वारा स्थापित दुर्गा देवी की पूजा, माहिका की कथा), ६.१९८ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : ब्राह्मणी - शूद्री तीर्थ का माहात्म्य), ६.२०८ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : गौतमेश्वर लिङ्ग के दर्शन), ६.२७६ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : एकादश रुद्रों की पूजा), ६.१५५ (ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी : दीर्घिका नामक सरसी में स्नान), ६.२५४ ( आषाढ शुक्ल चतुर्दशी : शिव द्वारा ताण्डव नृत्य), ६.६९ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : परशुराम ह्रद में तर्पण), ६.२०४ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : प्रेत मुक्ति हेतु श्राद्ध), ६.१०३ ( आश्विन् शुक्ल चतुर्दशी : आनर्त तडाग का माहात्म्य), ६.११६ ( आश्विन् शुक्ल चतुर्दशी : रेवती द्वारा अम्बा देवी की पूजा), ६.१५४ ( आश्विन कृष्ण चतुर्दशी : २७ लिङ्गों की पूजा), ६.१९९.५१ ( आश्विन् कृष्ण चतुर्दशी : कूपिका तीर्थ में स्नान), ६.१०३.७८ ( कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : श्वेत राजा द्वारा स्वदेह का भक्षण), ६.१८२ ( कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी : कपालेश्वर लिङ्ग की पूजा), ६.९५ ( माघ शुक्ल चतुर्दशी : अजापाल द्वारा चण्डी पूजा की कथा), ६.१२८ ( माघ चतुर्दशी : अटेश्वर की पूजा), ६.१४५ ( माघ शुक्ल चतुर्दशी : अमरत्व के लिए अमरेश्वर लिङ्ग की पूजा), ६.२६६ ( माघ कृष्ण चतुर्दशी : शिवरात्रि, चोर द्वारा अनायास शिव पूजा से मुक्ति), ७.१.८० ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : गौतमेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.९१ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : त्र्यम्बक रुद्र की पूजा), ७.१.२४८ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : ब्रह्मेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.२६० (चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : सिद्धेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.३.१७ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : पङ्गु तीर्थ में स्नान), ७.३.२२ ( चैत्र शुक्ल चतुर्दशी : श्रीमाता देवी द्वारा कलिङ्ग दानव पर विजय), ७.१.१७३ ( वैशाख शुक्ल चतुर्दशी : कुशक आदि लिङ्गों का माहात्म्य), ७.१.१२१ ( ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी : जामदग्नि लिङ्ग की पूजा), ७.१.७६ ( भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी : लकुलीश लिङ्ग की पूजा), ७.१.९४ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : भैरव रुद्र की पूजा), ७.१.२७५ ( भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी : त्रिनेत्र लिङ्ग की पूजा), ७.१.२२६ ( अश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी : देवशर्मा व यम का नरक सम्बन्धी संवाद), ७.१.२७३ (अश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी :शण्ड तीर्थ में स्नान, कपाल मोचन तीर्थ में श्राद्ध), ७.१.३०१ ( अश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी : सिद्धेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.३.३६ ( आश्विन् कृष्ण चतुर्दशी : चण्डिका आश्रम में पिण्ड दान), ७.१.३४० ( कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी : चण्डीश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.९० ( माघ कृष्ण चतुर्दशी :वृषणेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.११२ ( माघ कृष्ण चतुर्दशी : लक्ष्मणेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.१६८ ( माघ चतुर्दशी : शालकटङ्कटा देवी की पूजा), ७.१.१७९ ( माघ चतुर्दशी : माण्डव्येश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.३१९ ( माघ चतुर्दशी : स्थलेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.३.८ ( माघ कृष्ण चतुर्दशी : भद्रकर्ण ह्रद का माहात्म्य), ७.३.९ ( माघ कृष्ण चतुर्दशी : केदारेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.३.४७ ( माघ कृष्ण चतुर्दशी : गौतमेश्वर लिङ्ग के दर्शन), ७.३.३९ ( फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी : अचलेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.३.३५ ( फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी : मायु ह्रद में स्नान), महाभारत कर्ण ४४.२५( वाहीक देश में कृष्ण चतुर्दशी को राक्षसी के गान का कथन), लक्ष्मीनारायण १.२७९ ( वर्ष पर्यन्त चतुर्दशी के व्रतोत्सवों का वर्णन), १.३०६.७३ ( अधिक मास की चतुर्दशी को व्रत करने से प्राप्त फलों का वर्णन), १.३२१.१ ( चतुर्दशी व्रत के फलस्वरूप जन्मे राजा चित्रधर्म के पुत्र दृढधन्वा की कथा), २.९०.२२( कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को महामारी भैरवी द्वारा राक्षसियों को नष्ट करने का वृत्तान्त), २.१९५  २.२३७.२७ ( कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को की जाने वाली पूजा का वर्णन), ३.१०३.९  ( शुक्ल चतुर्दशी को दान से साम्राज्य प्राप्ति का उल्लेख ) chaturdashi /chaturdashee

 

चतुर्भुज पद्म ५.१८ (किरातों द्वारा चतुर्भुज रूप प्राप्ति का प्रसंग), वामन ९०.२५ (सूर्पारक तीर्थ में विष्णु का चतुर्बाहु नाम से वास), ९०.४२ (जम्बू द्वीप में विष्णु का चतुर्बाहु नाम से वास), स्कन्द ५.३.१४२.१० (आकाशवाणी द्वारा भीष्मक - कन्या रुक्मिणी को चतुर्भुज को देने का निर्देश, चतुर्भुज शिशुपाल को कन्या देने का आयोजन, चतुर्भुज कृष्ण द्वारा कन्या का हरण),५.३.१४२.४७ (रुक्म को साक्षात् चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन ) । chaturbhuja

 

चतुर्मुख मत्स्य ४.७(चतुर्मुख के सर्व वेदों के अधिष्ठाता होने का उल्लेख), २३.२०(सोम के राजसूय यज्ञ में चतुर्मुख के उद्गाता होने का उल्लेख), १५४.४८३(शिव - पार्वती के विवाह में चतुर्मुख के होता बनने का उल्लेख), स्कन्द ४.२.५५.९ (चतुर्मुखेश लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ) । chaturmukha

 

चतुर्वक्त्र नारद १.६६.११२(चतुर्वक्त्र की शक्ति लम्बोदरी का उल्लेख), वराह ५३.३(पशुपाल द्वारा योगनिद्रा में चतुर्वक्त्र, चतुष्पाद पुत्र का सृजन, चतुर्वक्त्र के पुत्र स्वर का वृत्तान्त ) ।

 

चतुर्वर्ण गणेश २१४८.२७ (ब्राह्मण आदि वर्णों के कर्मों का कथन), गरुड ३.२२.७८(ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि में श्रीहरि की नारायण, जनार्दन, प्रद्युम्न आदि नामों से स्थिति),  ब्रह्म १.११४ (चतुर्वर्ण का धर्म), ब्रह्मवैवर्त्त ४.८३.५१(चतुर्वर्ण के कर्तव्यों का वर्णन), ब्रह्माण्ड १.२.७.१६० (वर्ण अनुसार कर्मों का वर्णन), १.२.१३.६५(यज्ञ में रुद्र हेतु पृथक् भाग दिए जाने के कारण का कथन : देवों के चातुर्वर्ण द्वारा एकत्र भोजन करना), भविष्य ३.४.२३.९८ (चार वर्णों के अनुसार पितरों, देवों, यक्षों आदि की तृप्ति), भागवत ७.११ (चतुर्वर्ण के कर्तव्य), मार्कण्डेय २८.२ / २५.२ (मदालसा - अलर्क संवाद में वर्णाश्रम धर्म का वर्णन), वराह ११५.२३ (चतुर्वर्ण के भक्तियुक्त कर्मों का वर्णन), वामन ६.८६(विष्णु द्वारा शिव अर्चना हेतु शैव आदि ४ वर्णों की सृष्टि का कथन), वायु १००.४४/२.३८.४४(दक्ष - पुत्री सुव्रता व धर्म, भव, दक्ष, ब्रह्मा के मानसिक संयोग से उत्पन्न पुत्रों से चातुर्वर्ण के आरम्भ का कथन), स्कन्द ६.२४२ (चतुर्वर्ण की उत्पत्ति व कर्तव्य), महाभारत अनुशासन ६.१६ (ब्राह्मण द्वारा शौच से श्री की प्राप्ति, क्षत्रिय द्वारा पराक्रम से, वैश्य द्वारा पुरुषार्थ और शूद्र द्वारा शुश्रूषा से श्री की प्राप्ति का कथन), १४१.२८ (शिव - पार्वती संवाद में चतुर्वर्ण धर्म का निरूपण ) ; द्र. वर्ण, वर्णाश्रम chaturvarna

 

चतुर्व्यूह अग्नि २५.१ (चतुर्व्यूह आराधना का मन्त्र), २५.३ (चतुर्व्यूह मन्त्रों का पवित्र अधिवासन में प्रयोग), ३४.९ (चतुर्व्यूह मन्त्रों का पञ्च गव्य निर्माण हेतु प्रयोग), ४८ (चतुर्व्यूह का १२ विग्रहों में विस्तार), ५९.७(वासुदेव आदि चतुर्व्यूह की शब्द, स्पर्श आदि के रूप में विवेचना), नारद १.११३.६ (वासुदेव, संकर्षण , प्रद्युम्न व अनिरुद्ध रूप चतुर्मूर्ति पूजा का कथन), पद्म ६.२२८+ (दिशाओं के सापेक्ष चतुर्व्यूह की स्थिति, चतुर्व्यूह का वर्णन), ब्रह्म १.७१.१८(सगुण व निर्गुण ब्रह्मा की शुद्ध वासुदेव, तामस शेष, राजस आदि मूर्तियों के विशिष्ट कार्यों का कथन), ब्रह्माण्ड १.१.४.२३ (नारायण के एकल, द्वैध, त्रिगुणात्मक व चतुर्व्यूहात्मक रूपों का कथन), भविष्य ३.४.१५.६० (शंख, चक्र, शेषनाग व विष्णु के चतुर्व्यूह का क्रमश: शत्रुघ्न, भरत, लक्ष्मण व राम तथा अनिरुद्ध, प्रद्युम्न आदि रूप में अवतार), भागवत ५.१७.१५ (इलावृत वर्ष में भगवान भव द्वारा चतुर्व्यूहात्मक मूर्तियों में से स्वयं के रूप संकर्षण की आराधना), १२.११.२१ (विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तुरीय का चतुर्व्यूह स्वयं भगवान का होना), महाभारत शान्ति ३३९, ३४४, मार्कण्डेय ४.४४ (चतुर्व्यूहात्मक मूर्तियों के विशिष्ट कार्यों का कथन), विष्णुधर्मोत्तर १.१३६.३१ (आहवनीय, दक्षिण आदि अग्नियों का वासुदेव, संकर्षण आदि से तादात्म्य), १.१३९.२१ (पितरों के रूप में चतुर्व्यूह), २.१०८ (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध का पादोदक स्नान, कलश स्थापना का वर्णन), ३.४७.८ (वासुदेव आदि का बल, ज्ञान, ऐश्वर्य व शक्ति से तादात्म्य ;चतुर्मूर्तियों के साकार रूप का कथन), ३.१०६.२ (चतुर्व्यूह आवाहन मन्त्र), ३.१४०+ (बल, ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य की वासुदेव, संकर्षण, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न रूप में पूजा करने का वर्णन), शिव ७.२.३५.३३(चार वेदों के जाग्रत, स्वप्न आदि स्वरूपों का कथन), स्कन्द २.७.२०.४४ (उन्मेष के आरम्भ में विष्णु का वासुदेव आदि चतुर्व्यूहात्मक रूप धारण करके सायुज्य आदि मुक्ति प्रदान करने का वर्णन), योगवासिष्ठ ४.१९(जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय स्वरूप विचार), ६.२.१३७ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि के चतुर्व्यूह का वर्णन), ६.२.१४५+ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति का वर्णन), लक्ष्मीनारायण १.३०४.२५ (कण्ठ / विशुद्धि चक्र में वासुदेव आदि चतुर्व्यूह का ध्यान), २.९४ (बाल रूप में आए श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध व संकर्षण के चतुर्व्यूह को दिव्य दृष्टि से जानकर ऋषि लोमश द्वारा पूजा करने का वर्णन), ३.४७.२७ (अनिरुद्ध द्वारा जगत् के रूपवत् सृजन, प्रद्युम्न द्वारा पोषण व संकर्षण द्वारा विकर्षण का उल्लेख), महाभारत शान्ति ३३९.४० (वासुदेव के क्षेत्रज्ञ निर्गुण, संकर्षण के जीव, प्रद्युम्न के मन, अनिरुद्ध के व्यक्त अहंकार होने का वर्णन), ३४४.१४(प्राणियों का शुद्ध होकर क्रमश: सूर्य, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, संकर्षण व वासुदेव में प्रवेश करने का वर्णन ) । chaturvyuuha