PURANIC SUBJECT INDEX पुराण विषय अनुक्रमणिका

Puranic Subject Index

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चतुष्कोण स्कन्द ४.१.४१.११३(हृदय में चतुष्कोण में पृथिवी तत्त्व की धारणा का उल्लेख )

 

चतुष्पथ स्कन्द १.२.४०.२३५ (कलियुग में चतुष्पथ का शिव शूल बनना ) ।

 

चतुष्पद नारद १.६३.१२(सनत्कुमार द्वारा चतुष्पाद महाभागवत तत्त्व का वर्णन), वराह ५३.३(पशुपाल द्वारा योगनिद्रा में चतुर्वक्त्र, चतुष्पाद पुत्र का सृजन, चतुर्वक्त्र के पुत्र स्वर का वृत्तान्त ), वायु २३.७३/१.२३.८१(चतुष्पदा सरस्वती के दर्शन से पशुओं के चतुष्पाद होने का कथन), लक्ष्मीनारायण २.२४६.१५ (गुरु, व्रत, वेद तथा हरि स्वरूप ब्रह्म की चतुष्पदी द्वारा ब्रह्मारोहण करने का निर्देश ), चरक संहिता सूत्र १०.२(भेषज के चतुष्पाद, षोडशकल होने का उल्लेख) ; द्र. द्विपद । chatushpada

Remarks by Dr. Fatah Singh

चतुष्पात् अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोश को लेकर चलने वाला हिरण्यय कोश चतुष्पाद कहलाता है । दूसरी ओर , अन्नमय और प्राणमय कोशों को लेकर चलने वाले मनोमय कोश द्विपात् , दो पैरों वाले कहलाता है ।

 

 

चत्वर स्कन्द १.२.६२.३५(चत्वरों में दुरारोह क्षेत्रपालों की स्थिति का उल्लेख), ७.१.६२ (रौद्री देवी का रूप ; चत्वरा देवी का माहात्म्य ) ।

 

चन्दन अग्नि १९१.३(चन्दनाशी द्वारा पौष में योगेश्वर की पूजा का निर्देश), गर्ग ६.१५.१६ (गोपीचन्दन का माहात्म्य), नारद १.११५.२९ (भाद्रपद / नभस्य शुक्ल षष्ठी को चन्दन षष्ठी व्रत में सूर्य पूजा का कथन), पद्म १.२८.२९(चन्दन वृक्ष का आरोपण पुण्यप्रद होने का उल्लेख), ६.२९ (गोपीचन्दन का माहात्म्य व लेपन विधि), ६.६७ (गोपीचन्दन के माहात्म्य का वर्णन), ६.१४९ (चन्दनेश्वर तीर्थ में तीर्थ प्रभाव से चन्दन वृक्ष का शिवलिङ्ग होना), ब्रह्माण्ड २.३.१३.२४(चन्दन वृक्षों से ताम्रपर्मी नदी के प्रादुर्भाव व महत्त्व का कथन), वायु ४५.९७(चन्दना : भारत की नदियों में से एक), १०८.७९/२.४६.८२(वही), विष्णुधर्मोत्तर १.९६ (ग्रह नक्षत्रों के लिए पृथक् - पृथक् चन्दन लेपों का कथन), शिव २.१.१२.३४ (मय द्वारा चान्दन लिङ्ग की पूजा का उल्लेख), ७.१.३३.४१(वामदेव शिव हेतु चन्दन देने का निर्देश), स्कन्द २.५.६.३५ (पूजा में तुलसी काष्ठ चन्दन का महत्त्व), वा.रामायण ४.४१.४०(ऋषभ पर्वत पर उत्पन्न चन्दन वृक्षों के ३ प्रकारों का कथन, ऋषभ पर्वत पर उत्पन्न होने वाले चन्दनों के स्पर्श का निषेध), लक्ष्मीनारायण १.२२५.२० (गोपीचन्दन लगाने से मुक्ति का कथन), २.२७.१०६ (चन्दन की साध्य देवगण के हृदय से उत्पत्ति का उल्लेख), कथासरित् १२.१०.२० (धनदत्त द्वारा चन्दनपुर ग्राम जाने का वृत्तान्त), १४.४.१९८ (नरवाहनदत्त द्वारा चक्रवर्ती - रत्न चन्दन वृक्ष को सिद्ध करना ) । chandana

 

चन्दनोदकदुन्दुभि ब्रह्माण्ड २.३.७१.११९(विलोमा - पुत्र, अपर नाम अन्धक, अभिजित् - पिता), वायु ९६.११८/२.३४.११७(रैवत - पुत्र, अभिजित् - पिता ) ।

 

चन्दल भविष्य ३.४.२२.२६ (नर्तक चन्दल के पूर्वजन्म में मदन होने का उल्लेख ) ।

 

चन्द्र देवीभागवत ५.३०.२५(निशुम्भ की अष्ट चन्द्र वाली चर्म का उल्लेख), पद्म १.१५.३१८(भार्या के चन्द्रलोक की ईश्वरी होने का उल्लेख), ब्रह्माण्ड १.२.१८.७६(लवण समुद्र में उत्तर दिशा में डूबे पर्वतों में से एक), १.२.१९.८(प्लक्ष द्वीप के ७ पर्वतों / वर्षों में से एक, अश्विनौ द्वारा ओषधि संभरण का स्थान), २.३.६.९(निचन्द्र : कश्यप व दनु के विप्रचित्ति - प्रमुख १०० पुत्रों में से एक), २.३.७.१२४(चन्द्रभ : मणिभद्र यक्ष व पुण्यजनी के २४ पुत्रों में से एक), २.३.६३.१८९(चन्द्रचक्रा : लक्ष्मण - पुत्र चन्द्रकेतु की राजधानी), ३.४.४.९५(चन्द्रपुष्कर : लिपि न्यास के अन्तर्गत चन्द्रपुष्कर पीठ का उल्लेख), ३.४.३५.५१(सूर्य बिम्ब शाला के अन्तर्गत चन्द्रबिम्बशाला के महत्त्व का कथन), भागवत २.१०.३०(विराट् पुरुष के हृदय से मन, मन से चन्द्र आदि की उत्पत्ति का उल्लेख), ४.२८.३५(चन्द्रवशा : कुलाचल पर्वत से नि:सृत भारत की नदियों में से एक), ५.१९.१८(चन्द्रवसा/चन्द्रवंश्या : भारतवर्ष की नदियों में से एक), ५.१९.३०(चन्द्रशुक्ल : जम्बू द्वीप के ८ उपद्वीपों में से एक), ९.६.२०(विश्वरन्धि - पुत्र, युवनाश्व - पिता), १०.६१.१३(कृष्ण व सत्या के १० पुत्रों में से एक), १२.१.२७(चन्द्रविज्ञ : विजय - पुत्र, सलोमधि - भ्राता?), मत्स्य ६.११(बलि के पुत्रों में से एक), १२.५५(चन्द्रगिरि : तारापीड - पुत्र, इक्ष्वाकु वंश), १७९.२६(चन्द्रसेना : शिव द्वारा अन्धकासुर के रक्तपानार्थ सृष्ट मानस मातृकाओं में से एक), १९३.७५(नर्मदा में स्थित चन्द्रतीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य), २६२.१८(अर्धचन्द्रा पीठिका के पुत्रप्रदा होने का उल्लेख), वायु ४५.५२(उत्तर कुरु के दक्षिण में स्थित चन्द्रद्वीप के महत्त्व का वर्णन), ४९.७(प्लक्ष द्वीप के ७ पर्वतों / वर्षों में से एक, अश्विनौ द्वारा ओषधि संभरण का स्थान), ६८.८/२.७.८(दनु के पुत्रों में से एक), ६८.९/२.७.९(निचन्द्र : कश्यप व दनु के विप्रचित्ति - प्रमुख १०० पुत्रों में से एक), ६९.३५/२.८.३५(चन्द्रद्रुम : नरमुख किन्नरों में से एक), ६९.३६/ २.८.३६(चन्द्रवंश : नरमुख किन्नरों में से एक), ८८.१८८/ २.२६.१८७(चन्द्रवक्त्रा/चन्द्रवक्ता : लक्ष्मण - पुत्र चन्द्रकेतु की राजधानी), विष्णु २.४.७(प्लक्ष द्वीप के ७ वर्ष पर्वतों में से एक), ४.१.४१(नर - पुत्र, केवल - पिता, मरुत्त वंश), ४.१.५१(हेमचन्द्र - पुत्र, धूम्राक्ष - पिता, मरुत्त/तृणबिन्दु वंश), शिव ७.२.३८.३४(चान्द्र ऐश्वर्य के अन्तर्गत सिद्धियों के नाम), लक्ष्मीनारायण १.१५०.१८(विभिन्न भावों में चन्द्रमा का फल), ३.८.५२(सारङ्गवाहन नामक शतमूर्द्धा राजा द्वारा अर्धचन्द्र बाणों से विष्णु से युद्ध), कथासरित् ८.३.१८९ (विलासिनी द्वारा चन्द्रपाद पर्वत पर गुफा में रखी औषधियां सिद्ध करने का सूर्यप्रभ को निर्देश), १२.३१.२५ (चन्द्रसिंह / चण्डसिंह व उसके पुत्र सिंहपराक्रम द्वारा भार्याओं का चुनाव करने का वृत्तान्त ) ; द्र. गुहचन्द, चन्द्रमा, जयचन्द्र, परशुचन्द्र, सुचन्द्र, हरिश्चन्द्र । chandra

 

चन्द्रकला पद्म ७.५.४१ (चन्द्रकला नामक सुन्दर स्त्री से माधव को परस्त्री गमन दोष से बचने व सुलोचना नामक सुन्दर कन्या को प्राप्त करने की प्रेरणा प्राप्त होने का वर्णन), लक्ष्मीनारायण १.३२१.१०५ (चित्रबाहु नृप - भार्या, पूर्व जन्म की कथा ) । chandrakalaa

 

चन्द्रकान्त मत्स्य १२१.७३(चन्द्रकान्त पर्वत का इन्द्र के भय से लवण समुद्र में उत्तर में छिपने का उल्लेख), वराह ८४.१० (चन्द्रद्वीप के मध्य में चन्द्रकान्त - सूर्यकान्त नामक दो पर्वतों का उल्लेख), वायु ४५.२५, ४३(उत्तरकुरु में चन्द्रकान्त व सूर्यकान्त पर्वतों के बीज भद्रसोमा नदी के प्रवाहित होने आदि का कथन), वा.रामायण ७.१०२.६ (लक्ष्मण / भरत? - पुत्र चन्द्रकेतु के लिए बनाए नगर चन्द्रकान्त का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण ४.२.७७(राजा बदर द्वारा चन्द्रमा से प्राप्त चन्द्रकान्त मणि का जाल में प्रक्षेप करने से हिमालय की उत्पत्ति का वृत्तान्त ) । chandrakaanta

 

चन्द्रकान्ता गर्ग ७.२९.२९ (चन्द्रकान्ता नदी का माहात्म्य : मनु - पुत्र प्रमेधा की चन्द्रकान्ता नदी में स्नान से कुष्ठ से मुक्ति), ब्रह्माण्ड ३.४.४४.७५(५१ वर्णों के गणेशों की शक्तियों में से एक), भविष्य ३.३.२२.१८ (चन्द्रकान्ता वेश्या द्वारा जन्मान्तरों में बाण - पुत्री उषा, जम्बुक राजा की पुत्री विजयैषिणी व मयूरध्वज की पुत्री पुष्पवती बनने का कथन), वायु ४३.१९(भद्राश्व देश के जनपदों में से एक ) । chandrakaantaa

 

चन्द्रकान्ति भविष्य ३.२.४.२९ (धूर्त्त मदपाल द्वारा अपनी पत्नी चन्द्रकान्ति की हत्या का वर्णन), ३.३.५.६ (राजा अनङ्गपाल की ज्येष्ठ कन्या चन्द्रकान्ति से जयचन्द्र नामक पुत्र होने का उल्लेख),  लक्ष्मीनारायण ४.२.७७ (चन्द्रमा द्वारा राजा बदरी को चन्द्रकान्त मणि प्रदान करना, मणि के प्रभाव से हिमालय के निर्माण आदि का वर्णन, असुरों का नाश ) । chandrakaanti

 

चन्द्रकुल कथासरित् ८.५.९२ (चन्द्रकुल गिरि का उल्लेख ) ।

 

चन्द्रकेतु ब्रह्माण्ड २.३.६३.१८८(लक्ष्मण के २ पुत्रों में से एक, चन्द्रचक्रा पुरी - अधिपति), वायु ६९.२६/२.८.२६(गन्धर्वों में से एक का नाम), ८८.१८७/ २.२६.१८७(लक्ष्मण के २ पुत्रों में से एक, चन्दवक्त्रा पुरी - अधिपति), विष्णु ४.४.१०४(लक्ष्मण के २ पुत्रों में से एक), वा.रामायण ७.१०२.६ (लक्ष्मण / भरत? - पुत्र चन्द्रकेतु के मल्ल देश में चन्द्रकान्त नगर का राजा होने का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण ३.८६.६८ (चित्रकेतु द्वारा साधु सेवा का वर्णन ) । chandraketu

 

चन्द्रगुप्त ब्रह्माण्ड २.३.२८.३१ (मन्त्री चन्द्रगुप्त द्वारा राजा कार्त्तवीर्य को जमदग्नि की कामधेनु हरण का प्रस्ताव), ३.४.२५.९९ (भण्डासुर - सेनानी चन्द्रगुप्त का चित्रा देवी द्वारा वध होने का उल्लेख), भविष्य ३.२.३०.२० (ऋग~, यजु, साम और अथर्ववेद के निष्णात् विद्वान् व्याडि, मीमांसा, पाणिनी व वररुचि का राजा चन्द्रगुप्त से वार्तालाप), कथासरित् १.४.११६ (शकटाल द्वारा पूर्वनन्द - पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बनाये जाने का योगनन्द के भय का कथन), ८.५.९२ (चन्द्रमा से उत्पन्न विद्याधर चन्द्रगुप्त को श्रुतशर्मा द्वारा युद्ध के लिए भेजने का उल्लेख), ८.७.२२ (प्रज्ञाढ्य  द्वारा चन्द्रगुप्त का वध करने का कथन ) । chandragupta

 

चन्द्रचूड ब्रह्मवैवर्त्त १.१९.५० (कवच के अन्तर्गत चन्द्रचूड से कण्ठ की रक्षा की प्रार्थना), भविष्य ३.२.२६.९ (सत्यनारायण कथा व व्रत के प्रभाव से चन्द्रचूड को पुन: राज्य प्राप्ति का वर्णन ) । chandrachooda/ chandrachuuda

 

चन्द्रपुरुष मत्स्य ५७ (न्यास ) ।

 

चन्द्रप्रभ पद्म १.८.१०९ (शर वन में जाने से इल व उसके वाहन चन्द्रप्रभ अश्व के स्त्री रूप हो जाने का वर्णन), ब्रह्माण्ड १.२.१८.६८ (जम्बूनदी के निर्गम स्थान चन्द्रप्रभ गिरि का उल्लेख), मत्स्य १२.३ (इल के वाहन चन्द्रप्रभ अश्व द्वारा शिववन में प्रवेश पर अश्वी बनना), १२१.६(कैलास पर्वत के निकट चन्द्रप्रभ पर्वत की स्थिति का उल्लेख), वायु ४७.५ (मणिभद्र यक्ष के वास स्थान चन्द्रप्रभ गिरि का उल्लेख), ६९.१५५/२.८.१५०(मणिभद्र यक्ष व पुण्यजनी के २४ पुत्रों में से एक), स्कन्द ६.१९९.१३४ (चन्द्रप्रभ नामक ब्राह्मण रूपधारी कुम्भक चण्डाल की कथा), कथासरित् ३.६.२०३ (राजा आदित्यप्रभ द्वारा अपने पुत्र चन्द्रप्रभ का मांस खाने का वृत्तान्त), ८.१.१७(मयासुर द्वारा चन्द्रप्रभ - पुत्र सूर्यप्रभ को विद्याधर – चक्रवर्ती पद प्राप्ति कारक विद्याएं सिद्ध कराना), ८.२.७९ (मयासुर द्वारा चन्द्रप्रभ को परकाय - प्रवेश का उपदेश देकर राक्षस शरीर में प्रवेश हेतु बाध्य करना), ८.३.३१ (चन्द्रप्रभ के दूसरे पुत्र रत्नप्रभ को राज्य सौंपकर सूर्यप्रभ का विद्याधरों से युद्ध हेतु प्रस्थान), १२.२५.१३ (चन्द्रप्रभ के मन्त्री - पुत्र चन्द्रस्वामी का वृत्तान्त ) । chandraprabha

 

चन्द्रप्रभा स्कन्द ५.२.७८.३ (चित्रसेन व चन्द्रप्रभा - पुत्री लावण्यवती के पूर्वजन्म की कथा), लक्ष्मीनारायण ३.२२३.१ (चन्द्रप्रभा नदी के निकट श्री सम्पन्न अजपाल की कथा), कथासरित् ३.३.६५ (धर्मगुप्त वैश्य - पत्नी चन्द्रप्रभा द्वारा उत्पन्न सोमप्रभा का वृत्तान्त), ५.३.४० (शक्तिदेव द्वारा कनकपुरी में चन्द्रप्रभा विद्याधरी से मिलना), १२.१०.७ (राजकुमारी चन्द्रप्रभा की सारिका /

मैना द्वारा पुरुष को दुष्ट व कृतघ्न बताना), १२.२२.४ (यश:केतु - पत्नी चन्द्रप्रभा की पुत्री शशिप्रभा की कथा ) । chandraprabhaa

 

चन्द्रभट्ट भविष्य ३.३.६.९ (चन्द्रभट्ट द्वारा संयोगिनी स्वयंवर में पृथ्वीराज की सोने की मूर्ति लगवाना), ३.३.३०.३३ (पृथ्वीराज को उसके मन्त्री चन्द्रभट्ट द्वारा भावी आक्रमण की सूचना देना), ३.३.३२.२४६ (चन्द्रभट्ट द्वारा बन्धनग्रस्त पृथ्वीराज की आज्ञा से उनका वध करना ) । chandrabhatta

 

 चन्द्रभागा गर्ग ७.४३.११ (चन्द्रभागा - पति शोभन का उल्लेख), देवीभागवत ७.३०.७९(चन्द्रभागा तट पर कला देवी का वास), पद्म ३.१८.६४ (चन्द्रभागा में स्नान से चन्द्रलोक प्राप्ति का उल्लेख), ६.६० (मुचुकुन्द - पुत्री, नदी का अवतार , चन्द्रभागा - पति शोभन द्वारा रमा एकादशी  व्रत से मरण व इन्द्रलोक प्राप्ति का वर्णन), ६.६९.४४ (चन्द्रमा - पुत्री, शीतल जल वाली चन्द्रभागा के सूर्य - कन्या, उष्ण जल वाली तापी से सङ्गम का उल्लेख), ब्रह्मवैवर्त्त २.१७.१ (शिव द्वारा चन्द्रभागा के तट पर स्थित होकर शंखचूड को दूत भेजना), ब्रह्माण्ड १.२.१२.१५(आहवनीय अग्नि की १६ नदी रूपी धिष्णी पत्नियों में से एक), १.२.१६.२५(हिमालय से नि:सृत नदियों में से एक), भविष्य १.७४.२२ (चन्द्रभागा तट पर भानु की मित्र नामक १२वीं मूर्ति की स्थिति ; साम्ब द्वारा कुष्ठ नाश हेतु चन्द्रभागा तट पर सूर्य की आराधना), ४.७५.५० (चन्द्रमा - पुत्री शीतल जल वाली चन्द्रभागा नदी का सूर्यकन्या उष्ण जल वाली तोषा नदी के साथ संगम का वर्णन), भागवत ५.१९.१८(भारत की नदियों में से एक), १२.१.३९(कलियुग में चन्द्रभागा तट आदि प्रदेशों पर शूद्रों आदि के राज्य करने का उल्लेख), मत्स्य ५१.१३(हव्यवाहन अग्नि की १६ पत्नियों में से एक), ११४.२१(हिमवान के पार्श्व से नि:सृत नदियों में से एक), १३३.२३(शिव के रथ में चन्द्रभागा आदि नदियों के वेणु रूप होने का उल्लेख), १९१.६४(नर्मदा तट पर स्थित चन्द्रभागा तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य : चन्द्रलोक की प्राप्ति), वायु २९.१३(आहवनीय अग्नि की १६ नदी रूपी धिष्णी पत्नियों में से एक), ४५.४९(हिमालय से नि:सृत नदियों में से एक), विष्णु २.३.१०(हिमालय से नि:सृत नदियों में से एक), ४.२४.६९(कलियुग में चन्द्रभागा तट आदि प्रदेशों पर शूद्रों आदि के राज्य करने का उल्लेख), विष्णुधर्मोत्तर १.२१५.४६ (चन्द्रभागा नदी द्वारा सिंह पर चढकर विष्णु की देवयात्रा दर्शन हेतु जाने का उल्लेख), शिव २.२.५.३३ (सन्ध्या का कामुक शरीर के त्याग हेतु चन्द्रभागा नदी तट पर स्थित चन्द्रभाग पर्वत पर जाना, चन्द्रभाग पर्वत से चन्द्रभागा नदी के उद्भव आदि का कथन), स्कन्द ५.३.१९८.८६ ( चन्द्रभागा में देवी के काला नाम का उल्लेख), ७.४.१४.४८(पञ्चनद तीर्थ में अङ्गिरस के पावनार्थ  चन्द्रभागा नदी के आगमन का उल्लेख), ७.४.१६.९ (चन्द्रभागा तीर्थ का माहात्म्य : वाजपेय फल की प्राप्ति), लक्ष्मीनारायण १.२२६.७७(चन्द्रभागा के स्वरूप का कथन ; कृष्ण व बलराम की भगिनी), १.२६०.३४ (चन्द्रभागा - पति शशिसेन द्वारा चन्द्रभागा - पिता मुचुकुन्द के भय से ज्वर पीडित होने पर एकादशी व्रत करने व व्रत में मरने से स्वर्ग प्राप्त करने की कथा), १.३१४.६२ (वसिष्ठ द्वारा सन्ध्या को चन्द्रभाग गिरि पर स्थित बृहल्लोहित सरोवर पर तप करने का निर्देश ; स्थान की महिमा का वर्णन ; चन्द्रभाग पर्वत से चन्द्रभागा नदी का उद्भव ) । chandrabhaagaa

 

चन्द्रभानु गर्ग ७.१५.७ (कृष्ण - पुत्र, प्रद्युम्न - सेनानी चन्द्रभानु द्वारा वीरधन्वा राजा पर विजय पाना), ७.२४.३ (सत्यभामा - पुत्र चन्द्रभानु का कुबेर - पुत्र मणिग्रीव से युद्ध), ब्रह्मवैवर्त्त (देवताओं द्वारा द्वितीय द्वार के रक्षक चन्द्रभानु से भेंट का कथन ) । chandrabhaanu