PURANIC SUBJECT INDEX पुराण विषय अनुक्रमणिका

Puranic Subject Index

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गोभुज स्कन्द ३.२.१०.३१ ( विश्वावसु गन्धर्व की कन्याओं से गोभुज वणिजों का विवाह तथा सन्तति का कथन ) ।

 

गोमती गर्ग ६.१०.६ ( श्रीहरि के अश्रुबिन्दुओं से गोमती महानदी की उत्पत्ति, चक्रांकित पाषाणों का स्थान, गोमती के माहात्म्य का कथन ), ६.१३ ( गोमती - सिन्धु सङ्गम तीर्थ का माहात्म्य : राजमार्गपति वैश्य के उद्धार की कथा ), देवीभागवत १२.६.४० ( गायत्री सहस्रनामों में से एक ), ब्रह्म १.६९ ( गोमती नदी के तट पर कण्डु मुनि के आश्रम का उल्लेख ), ब्रह्माण्ड १.२.१६.२६ ( हिमवत्पाद से नि:सृत नदियों में से एक ), २.३.६७.२९ ( क्षेमक राक्षस से पीडित काशिराज के काशी नगरी का परित्याग कर गोमती तट पर स्थित नगरी में निवास का उल्लेख ), भागवत १०.७९.११ ( बलभद्र की तीर्थयात्रा प्रसंग में गोमती में स्नान का उल्लेख ), मत्स्य १३.२८ ( गोमन्त पर गोमती नाम से सती देवी के वास का उल्लेख ), २२.३१ ( पितर श्राद्ध हेतु गोमती नदी की प्रशस्तता का उल्लेख ), ११४.२२ ( हिमालय की उपत्यका से नि:सृत नदियों में से एक ), १६३.६३ ( हिरण्यकशिपु द्वारा प्रकम्पित नदियों में से एक ), वामन ९०.३१ ( गोमती में विष्णु का छादितगद नाम से वास ), वायु २.९ ( नैमिष क्षेत्र में प्रवाहित एक नदी ), ४५.९५ ( हिमवत्पाद से नि:सृत एक नदी ), ९२.२६ ( निकुम्भ द्वारा शापित वाराणसी का परित्याग कर राजा दिवोदास द्वारा गोमती - तट पर राजधानी बसाने का उल्लेख ), विष्णु ३.१४.१८ (गोमती में स्नान, अर्चनादि से पाप नाश का उल्लेख ), विष्णुधर्मोत्तर १.२१५.४४ ( गोमती नदी द्वारा शिशुमार वाहन से श्रीहरि के अनुसरण का उल्लेख ), स्कन्द २.३.१.२८ ( गोमती में स्नान से मुक्ति प्राप्ति का उल्लेख ), ५.१.६२.१ ( गोमती कुण्ड का माहात्म्य : सान्दीपनी मुनि की सन्ध्या का स्थान, सान्दीपनी से गोमती महत्त्व जानकर कृष्ण द्वारा कुशस्थली/उज्जयिनी में गोमती की स्थापना का वर्णन ), ५.३.१९८.६५ ( गोमन्त तीर्थ में उमा की गोमती नाम से स्थिति का उल्लेख ), ७.४.५+ ( वसिष्ठ - सुता बनकर गोमती नदी के स्वर्ग से अवतरण, निरुक्ति व माहात्म्य का वर्णन ), ७.४.१४.४७( पञ्चनद तीर्थ में मरीचि के पावनार्थ गोमती नदी के आगमन का उल्लेख ), ७.४.२९.४४ ( गौतमी द्वारा नारद से पाप प्रक्षालनार्थ उपाय की पृच्छा, शिव के निर्देश पर द्वारका में गोमती में स्नान हेतु जाना ), वा.रामायण २.४९.१२ ( कोसल जनपद से निकलकर वेदश्रुति, गोमती एवं स्यन्दिका नदियों को पार करके राम का लक्ष्मणादि सहित शृङ्गवेरपुर पहुंचना ), लक्ष्मीनारायण १.२१९ ( गोमती नदी के प्रादुर्भाव का इतिहास, गोमती तीर्थ निर्माण तथा माहात्म्य ), ४.३८.९ ( गोमती नामक शूद्रा की कुटुम्ब सहित क्षय रोग ग्रस्तता, साधु सेवा से रोग मुक्ति का वर्णन ), ४.१०१.९२ ( कृष्ण - पत्नी गोमती के पुत्र - पुत्री युगल का नामोल्लेख ) । gomatee/gomati

 

गोमन्त मत्स्य १३.२८( गोमन्त में गोमती नाम से सती देवी के वास का उल्लेख ), स्कन्द ५.३.१९८.६५ (गोमन्त तीर्थ में उमा की गोमती नाम से स्थिति का उल्लेख ), हरिवंश २.३९.६४ ( परशुराम द्वारा कृष्ण - बलराम को गोमन्त गिरि चलने का परामर्श ), २.४० ( कृष्ण - बलराम व परशुराम का गोमन्त गिरि पर आरोहण, गोमन्त की शोभा का वर्णन ), २.४२ ( जरासन्ध की सेना के पर्वत पर आक्रमण तथा जरासन्ध द्वारा गोमन्त - दाह का वर्णन ) । gomanta

 

गोमय देवीभागवत ११.११.३ ( गोमय से भस्म निर्माण का कथन ), वराह १३९ ( गोमय लिम्पन का संक्षिप्त माहात्म्य ), स्कन्द ५.३.८३.१०९ ( गौ के गोमय /गोबर में लक्ष्मी की स्थिति का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण २.१५.३० ( गोमय में लक्ष्मी की स्थिति का उल्लेख ) । gomaya

 

गोमा ब्रह्माण्ड २.३.५.४० ( प्रह्लाद - पुत्र शम्भु के दो पुत्रों में से एक ), २.३.७.२ (  मौनेय नामक १६ देवगन्धर्वों में से एक ), वायु ६७.८१ ( प्रह्लाद - पुत्र शम्भु के दो पुत्रों में से एक ) ।

 

गोमायु मत्स्य १४८.४७ ( महिष दैत्य के ध्वज पर गोमायु चिह्न के अङ्कित होने का उल्लेख ), कथासरित् १०.७.१२५ ( कर्ण व हृदय से हीन गर्दभ की कथा में गोमायु / सियार की दुष्टता व चतुरता ) ।

 

गोमित्र वामन ९०.३४ ( वलभी में विष्णु का गोमित्र नाम से वास ) ।

 

गोमुख नारद १.६६.१०८( तिथीश की शक्ति गोमुखी का उल्लेख ), ब्रह्मवैवर्त्त २.३०.१३९ ( गोमुख नरक प्रापक दुष्कर्मों का कथन : तृषिता गौ का जल से वारण करने  पर गोमुख नरक की प्राप्ति ), ब्रह्माण्ड १.२.२०.२२ ( द्वितीय पाण्डुभौम सुतल में निवास करने वाले राक्षसों में से एक ), वायु ५०.२१ ( द्वितीय पाण्डुभौम तल में गोमुख राक्षस के नगर का उल्लेख ), ६७.८१ ( प्रह्लाद - सुत शम्भु के अनेक पुत्रों में से एक ), विष्णु ३.४.२२ ( वेदमित्र के ५ शिष्यों में से एक ), स्कन्द १.२.६२.२८( क्षेत्रपालों के ६४ प्रकारों में से एक ), ६.९३ ( गोमुख तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन : अम्बरीष  - पुत्र की गोमुख तीर्थ में स्नान से कुष्ठ से मुक्ति ), वा.रामायण ७.२८.१० ( मातलि - पुत्र, जयन्त - सारथी, मेघनाद द्वारा गोमुख पर बाण वर्षा का उल्लेख ), कथासरित् ४.३.५७ ( नित्योदित / इत्यक नामक द्वारपालाध्यक्ष का पुत्र, आकाशवाणी द्वारा गोमुख के वत्सराज - कुमार के भावी मन्त्री होने का उल्लेख ), ६.८.११५ ( नरवाहनदत्त का युवराज पद पर  अभिषेक होने पर इत्यक - पुत्र गोमुख को प्रधान द्वारपाल बनाने का उल्लेख ), ६.८.२१६ ( कलिङ्गसेना द्वारा गोमुख से स्वसुता मदनमञ्चुका के विद्याधर द्वारा किए गए अपहरण के प्रयास का कथन ), १४.२.५९ ( नरवाहनदत्त के प्रिय मित्रों में से एक गोमुख के चतुर होने का उल्लेख ), १७.१.११ ( मानसवेग द्वारा रानी मदनमञ्चुका के हरण से दुखी हुए नरवाहनदत्त को गोमुख द्वारा सान्त्वना प्रदान का प्रसंग ) । gomukha

 

गोमूत्र भागवत ९.१०.३४( भरत द्वारा तप काल में गोमूत्र से संस्कृत यव भक्षण का उल्लेख )

 

गोमेदक ब्रह्माण्ड १.२.१९.७ ( प्लक्ष द्वीप के ७ पर्वतों में से एक, गोमेदक के नाम पर गोमेद वर्ष के नामकरण का उल्लेख ), मत्स्य १२३ ( गोमेदक द्वीप का वर्णन ), वायु ४९.६ ( प्लक्ष द्वीप के ७ पर्वतों में से  एक गोमेदक के नाम पर गोमेदक वर्ष के नामकरण का उल्लेख ), ४९.१३( गोमेदक वर्ष के दूसरे नाम शान्तभय का उल्लेख ), विष्णु २.४.७ ( गोमेद : प्लक्ष द्वीप के सात पर्वतों में से एक ) । gomedaka

 

गोमेध स्कन्द ६.२६३.१२ ( योगी द्वारा वाणी जय की गोमेध संज्ञा का उल्लेख ) ।

 

गोरक्षक वराह २१५.९६ ( गोरक्षक तीर्थ के दर्शन से गोसहस्र फल प्राप्ति का उल्लेख ) ।

 

गोरख भविष्य ३.३.२४.५८ ( कृष्णांश आदि द्वारा गोरख नामक योगी की आराधना हेतु नर्तन, प्रसन्न गोरख योगी द्वारा संजीवनी विद्या प्रदान करने का कथन ), ३.४.१२.४६ ( गोरख के गुरु रूप में मच्छन्द का उल्लेख ) । gorakha

 

गोरोचन स्कन्द १.२.१३.१९१( शतरुद्रिय प्रसंग में शेष द्वारा गोरोचनमय लिङ्ग की पशुपति नाम से पूजा का  उल्लेख ) ।

 

गोल हरिवंश ३.१११.४( सुधर्मा सभा में कृष्ण की सात्यकि के साथ गोलक्रीडा का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.३७०.९८ ( नरक में गोल कुण्ड प्रापक कर्मों का उल्लेख ) ।

 

 गोलक ब्रह्माण्ड ३.४.१.१५६ ( संवर्तक अग्नि द्वारा ब्रह्माण्डगोलक के दहन का उल्लेख ), वराह १८९.२३ ( श्राद्ध में गोलक ब्राह्मण के आमन्त्रण का निषेध, मेधातिथि राजा का वृत्तान्त ), वायु ६०.६४ (शाकल्य के पांच शिष्यों में से एक ), १००.१५९ ( संवर्तक अग्नि द्वारा ब्रह्माण्डगोलक के दहन का उल्लेख ), स्कन्द ७.४.१७.३२ ( द्वारका के उत्तर द्वार पर गोलक राक्षस की स्थिति का उल्लेख ), ७.४.२०.८ ( गोलक प्रभृति दैत्यों द्वारा दुर्वासा के स्नान में विघ्न, संकर्षण द्वारा गोलक के वध का वर्णन ) ।

 

गोलभ स्कन्द ३.१.१२.१८ ( गोलभ राजा द्वारा मनोजव राजा से राज्य का हरण, ब्रह्मास्त्र से गोलभ की मृत्यु ), लक्ष्मीनारायण १.४३७.६ ( क्रूरकर्म विपाक से मनोजव नामक राजा की गोलभ नामक राजा से पराजय का उल्लेख ) । golabha

 

गोलाङ्गूल ब्रह्माण्ड २.३.७.२४४ ( प्रधान वानरों में से एक ), लिङ्ग २.५.७७ ( नारद तथा पर्वत मुनि का अम्बरीष - कन्या श्रीमती पर मोहित होना, कन्या प्राप्ति हेतु नारद का श्रीहरि के समीप गमन तथा पर्वत मुनि को गोलाङ्गूल / वानरवत् करने की अभ्यर्थना, पर्वत मुनि की भी श्रीहरि से नारद को वानरवत् करने की अभ्यर्थना, दोनों का हरि कृपा से गोलाङ्गूलवत् होकर श्रीमती को वरण करने से वंचित होने का वृत्तान्त ) । golaangoola/ golaanguula/ golangula

 

गोलोक गर्ग १.२.३२ ( गोलोक की शोभा का वर्णन ), ५.१७.२ ( कृष्ण विरह पर गोलोकवासिनी गोपियों द्वारा व्यक्त उद्गारों का कथन ), ब्रह्मवैवर्त्त १.२.६ ( तीनों लोकों से ऊपर गोलोक की स्थिति, उसके ऐश्वर्य तथा नित्यता का कथन ), १.५ ( गोलोक में कृष्ण द्वारा गौ - गोपादि की सृष्टि का कथन ), १.२८.४० (कृष्ण - अधिष्ठित गोलोक के ऐश्वर्य का कथन ), २.५४.५ ( गोलोक के ऐश्वर्य का वर्णन ), २.५४.१४९ (सुयज्ञ राजा द्वारा गोलोक के दर्शन ), ३.४२.६२ ( गोलोक में ही प्रकृति के राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा व सरस्वती नामक पांच रूपों में परिणत होने का उल्लेख ), ३.४२.६९ ( वैकुण्ठ से ५० कोटि योजन पर गोलोक की स्थिति तथा गोलोक से परे किसी अन्य लोक के न होने का कथन ), ४.४.७८ ( ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ पृथ्वी तथा देवों का गोलोक गमन, गोलोक के ऐश्वर्य का वर्णन ), ४.३५.५ ( कृष्ण के आदेश से ब्रह्मा के गोलोक जाने तथा प्रकृति की अंश स्वरूपा भारती को प्राप्त करने का उल्लेख ), ४.७३.१६ (गोलोक के ऐश्वर्य का वर्णन ), भागवत १०.२७.१ ( गोवर्धन धारण द्वारा व्रज की रक्षा करने पर गोलोक से कृष्ण के समीप सुरभि धेनु के आगमन का उल्लेख ), महाभारत अनुशासन ८१.१९, ८३,  वायु १०४.५३ ( गोलोक में श्रीकृष्ण परब्रह्म के निवास का उल्लेख ), शिव ५.१९.४० ( शिवलोक के समीप गोलोक का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.१२० ( कृष्ण के निवास स्थान गोलोक के वर्णनान्तर्गत विरजा नदी, शतशृङ्ग पर्वत, रासमण्डल, वृन्दावन, अक्षयवटादि का वर्णन ), १.१२१ ( गोलोक के प्राकार, प्रासाद, उद्यान, अन्त:पुर तथा १६ गोपुरादि का वर्णन ), १.१७० ( गोलोक में कृष्ण के अङ्गों से गोप, गोपी, गौ, गण, हंस, तुरग, सिंहादि के आविर्भाव का कथन ), १.१८४.१३ ( विधुर शिव द्वारा सती का स्मरण, अदृश्यरूपा सती द्वारा शिव को दुःख निरास हेतु गोलोक धाम गमन का परामर्श, शिव का गोलोक गमन, गोलोक में वृषभ रूप धारण कर गौओं के साथ विहरण, सती का अदृश्य रूपा होकर गौओं में निवास का कथन ), १.२१७ ( शर्याति - पुत्र आनर्त का कृष्ण के साथ गोलोक गमन, कृष्ण द्वारा आनर्त को गोलोक का एक दिव्य खण्ड प्रदान करना, गोलोक खण्ड की पश्चिम समुद्र तट पर स्थापना, कालान्तर में इसी खण्ड पर द्वारका के निर्माण का कथन ), १.२९९.७८ ( अधिक मास में पुरुषोत्तम पूजन तथा सप्तमी के एकभुक्त व्रत के प्रभाव से सिद्धि व बुद्धि का एक स्वरूप से कृष्ण के साथ गोलोक में वास तथा द्वितीय स्वरूप से गणपति के साथ विवाह ), १.३००.६८ ( अधिकमास में व्रत के प्रभाव से गोलोक धाम तथा गोलोकेश श्री राधाकृष्ण की प्राप्ति का उल्लेख ), १.३१५.६ ( गोलोक में कृष्ण द्वारा महोत्सव आयोजन का वर्णन ), १.३२४.१३ ( राधा से ईर्ष्या करने पर कृष्ण - पत्नी वृन्दा का गोलोक से पतन ), १.३३२ ( गोलोक में कृष्ण - पत्नियों गङ्गा, पद्मा व सरस्वती की परस्पर कलह, परस्पर शाप प्रदान तथा नदी रूपता का वृत्तान्त ), १.३७७ (गोलोकस्थ राधा द्वारा पुत्रियों हेतु कथित पतिव्रताचार धर्म पालन, माहात्म्यादि का निरूपण ), १.४२२.६४ ( राधा के रोष से ब्रह्मप्रिया व पम्पा का गोलोक से अवतरण, रामचन्द्र के योग से शबरी व पम्पा के पुन: गोलोक गमन का वर्णन ), १.४६८ ( कलावती नामक नर्तकी के सखियों सहित कृष्ण से विवाह तथा गोलोक गमन का वर्णन ), २.१४०.८ ( २५ प्रकार के प्रासादों में से एक गोलोक के ९९९ स्तम्भों से युक्त होने का उल्लेख ) । goloka

 

गोलोकनाथ ब्रह्मवैवर्त्त ३.३१.४० (गोलोकनाथ कृष्ण से आग्नेयी दिशा में रक्षा की प्रार्थना ), ब्रह्माण्ड २.३.३३.२२ ( कृष्ण कवच में कृष्ण का एक नाम, गोलोकनाथ से आग्नेयी दिशा में रक्षा की प्रार्थना का उल्लेख ) ।

 

गोवत्स नारद १.१२१.२७ ( गोवत्स द्वादशी व्रत की विधि ), भविष्य ४.६९ ( गोवत्स द्वादशी व्रत की विधि का वर्णन ), स्कन्द ३.२.२७ ( गोवत्सेश्वर लिङ्ग की उत्पत्ति तथा माहात्म्य का वर्णन ) । govatsa

 

गोवर्धन गर्ग १.२.३२ ( गोलोक में गोवर्धन नामक गिरिराज के विराजित होने का उल्लेख ), २.२ ( भारत से पश्चिम दिशा में शाल्मलि द्वीप में द्रोणाचल - पुत्र गोवर्धन पर्वत का जन्म, देवों द्वारा स्तुति, पुलस्त्य ऋषि का आगमन तथा गोवर्धन को काशी में ले जाने हेतु द्रोणाचल से याचना, शापभय से द्रोणाचल द्वारा स्वीकृति प्रदान, पुलस्त्य का हथेली पर रख कर गोवर्धन को काशी ले जाना, व्रजमण्डल में निवास की इच्छा से गोवर्धन का  भारी होना, चकित पुलस्त्य द्वारा व्रज में गोवर्धन को रखना, प्रतिज्ञा अनुसार गोवर्धन का व्रज में ही रहना, क्रुद्ध पुलस्त्य द्वारा गोवर्धन को तिल-तिल क्षरित होते रहने के शाप का वृत्तान्त ), ३.१.११ (श्रीहरि के वक्ष:स्थल से गोवर्धन का प्राकट्य तथा पुलस्त्य ऋषि के प्रभाव से व्रजमण्डल में आगमन का उल्लेख ), ३.१.१५ ( कृष्ण द्वारा गोवर्धन पूजा विधि का कथन ), ३.२ ( गोपों द्वारा गिरिराज गोवर्धन पूजन महोत्सव का वर्णन ), ३.३ ( कृष्ण का गोवर्धन पर्वत को उठाकर इन्द्र द्वारा करायी गई घोर जलवृष्टि से गोपों की रक्षा का वृत्तान्त ), ३.७ ( गोवर्धन के अङ्गभूत तीर्थों, कुण्डों, मन्दिरों आदि का वर्णन ), ३.८ ( गोवर्धन के विभिन्न तीर्थों में गोवर्धन के अङ्गों की स्थिति का वर्णन ), ३.९ ( राधा - कृष्ण के रास हेतु कृष्ण के तेज से गोवर्धन का निर्माण, अपर नाम शतशृङ्ग, शाल्मलि द्वीप में जन्म, पुलस्त्य द्वारा व्रजमण्डल में आगमन का कथन ), ३.१० ( गोवर्धन शिला के स्पर्श से राक्षस के उद्धार की कथा तथा गोवर्धन माहात्म्य का वर्णन ), ५.१७.८ ( गोवर्धन वासिनी गोपियों द्वारा कृष्ण विरह पर व्यक्त प्रतिक्रिया ), १०.४२.८ ( गोवर्धन गिरि के स्वरूप का उल्लेख ), नारद २.८०.८७ ( गोवर्धन नामक द्विज का तपोबल से विष्णु का दर्शन, वर प्रदान के रूप में विष्णु की गोवर्धन के पृष्ठ पर स्थिति, विष्णु का पर्वत रूप होना, कृष्णावतार में भगवान् का गोवर्धन द्विज को अन्नराशि , दुग्ध राशि, जलराशि आदि से तृप्त करने का कथन ), पद्म ६.१२२.२९ ( कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का कथन ), ब्रह्म १.७९.२१ ( कृष्ण के कहने पर व्रज गोपों द्वारा इन्द्र यज्ञ का परित्याग कर गोवर्धन गिरि यज्ञ का प्रवर्तन ), २.२१ ( गोवर्धन तीर्थ का माहात्म्य : गौ पर अत्याचार के कारण नन्दी द्वारा मनुष्य लोक से गौ का हरण, देवों की प्रार्थना पर गौतमी गङ्गा के पार्श्व में नन्दी द्वारा पुन: गौ का वर्धन ), ब्रह्मवैवर्त्त ४.२१.८७ ( इन्द्रयाग के अवसर पर कृष्ण द्वारा वस्तुओं का अर्ध भाग गोवर्धन को प्रदान करने, गोवर्धन के पुण्यतम होने तथा शब्द निरुक्ति का कथन ), ब्रह्माण्ड १.२.१६.४४ ( गोदावरी तट पर राम द्वारा गोवर्धन नामक नगर की स्थापना का उल्लेख ), भविष्य ३.३.२१.६३ ( कलियुग में गोवर्धन के मकरन्द के रूप में अवतरण का उल्लेख ), ३.४.२५.१६५ ( मनस् प्रकृति से गोवर्धन पर्वत की उत्पत्ति का उल्लेख ), भागवत ५.१९.१६ ( भारतवर्ष के प्रमुख पर्वतों में से एक ), १०.२५ ( इन्द्रयाग के स्थान पर गोवर्धन - पूजा, इन्द्र के वृष्टि प्रकोप से रक्षार्थ कृष्ण द्वारा गोवर्धन - धारण का वर्णन ), वराह १६४.१ ( मथुरा के पश्चिम् भाग में गोवर्धन क्षेत्र की स्थिति का उल्लेख ), वायु ४५.११३ ( गोदावरी तटस्थ गोवर्धन प्रदेश में भरद्वाज मुनि द्वारा राम की प्रसन्नता हेतु वृक्षारोपण का उल्लेख ), विष्णु ५.१०.३८ ( कृष्ण द्वारा व्रज में इन्द्र पूजा के स्थान पर गोवर्धन पूजा के औचित्य का कथन ), ५.११.१६ ( इन्द्र कोप से पीडित गोकुल की रक्षार्थ कृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण द्वारा गोकुल की रक्षा का वर्णन ), ५.१२.४(गरुड का रूप?), स्कन्द २.४.१०.२२ ( गोवर्धन पूजा विधि का कथन ), २.६.२.३० ( गोवर्धन के समीप वृन्दारण्य में कृष्ण कीर्तनोत्सव का उल्लेख ), हरिवंश २.१६ ( कृष्ण द्वारा गिरियज्ञ / गोवर्धन पूजा प्रवर्तन का प्रस्ताव ), २.१७ ( गोपों द्वारा गिरियज्ञ का अनुष्ठान ), २.१८ ( अतिवर्षा से पीडित गौ व गोपों के रक्षार्थ कृष्ण द्वारा महीधर /गोवर्धन धारण ), ३.१२७ ( गोवर्धन पर्वत के समीप हंस और डिम्भक के साथ यादवों का युद्ध ), ३.१२८ ( यशोदा व नन्द का गोप सहित गोवर्धन पर आकर कृष्ण व बलभद्र से मिलन ), लक्ष्मीनारायण १.३४८.१( मथुरा के पश्चिम में स्थित गोवर्धन तीर्थ की परिक्रमा आदि के माहात्म्य का कथन ) । govardhana

 

गोवाट कथासरित् ३.६.१३५ ( दस्यु भय से सुन्दरक के गोवाट / गोशाला में ठहरने का उल्लेख ) ।

 

गोविन्द गरुड ३.२२.७८(वैष्णवों में श्रीहरि की गोविन्द नाम से स्थिति), ब्रह्म २.५२.९७ ( इन्द्र को त्रिलोकी का राज्य देने पर विष्णु का एक नाम ), ब्रह्मवैवर्त्त १.१९.३४ (गोविन्द से वारुणी / पश्चिम दिशा में रक्षा की प्रार्थना ), ३.३१.२९ ( गोविन्द से दन्तपंक्तियों की रक्षा की प्रार्थना ), ३.३१.४२ ( गोविन्द से वायव्य दिशा में रक्षा की प्रार्थना ), ४.१२.१९ ( गोविन्द से कपोल की रक्षा की प्रार्थना ), ब्रह्माण्ड २.३.३३.८ ( कृष्णकवच में कृष्ण का एक नाम, गोविन्द से नासिका की रक्षा की प्रार्थना ), २.३.३३.२४ ( गोविन्द से वायव्य दिशा में रक्षा की प्रार्थना ), भविष्य ३.४.१४.९७ (गोविन्द शब्द की निरुक्ति ), ४.७० ( गोविन्द शयन उत्थापन द्वादशी व्रत के माहात्म्य का वर्णन ), ४.७८ (गोविन्द द्वादशी व्रत का वर्णन ), भागवत ६.८.२० ( गोविन्द से सङ्गव काल में रक्षा की प्रार्थना ),महाभारत शान्ति ३४२.७०(गोविन्द शब्द की निरुक्ति – गुहा गत नष्ट गौ को जानने वाला), वराह १.२५ ( गोविन्द से गुह्य भाग की रक्षा की प्रार्थना ), ८८.२(क्रौञ्च द्वीप के पर्वतों में से एक, अपर नाम द्विविन्द), १६३.१८ ( मथुरा रूपी पद्म के उत्तर दल में गोविन्द की स्थिति का उल्लेख ), वामन ९०.२ ( हस्तिनापुर में विष्णु का गोविन्द नाम से वास ), वायु ९६.३२, ४५ ( कृष्ण का एक नाम ), विष्णु १.४.४३ (पृथ्वी के समुद्धार हेतु गोविन्द से प्रार्थना ), १.१४.१५ ( प्रजा वृद्धि हेतु प्रचेताओं को गोविन्द आराधना का निर्देश, प्रचेताओं द्वारा गोविन्द - स्तुति ), १.१९.३७ ( प्रह्लाद द्वारा गोविन्द की सर्वत्र स्थिति तथा मित्र अमित्र भाव की व्यर्थता का उल्लेख ), विष्णु ५.५.१८ ( गोपनन्द द्वारा गोविन्द से बालकृष्ण के शिर की रक्षा करने की प्रार्थना ), ५.१२.१२ (गोविन्द शब्द की निरुक्ति ), ५.१६.३ ( केशी से भयभीत गोपों का गोविन्द की शरण में जाने का उल्लेख ), ५.२०.११ ( कुब्जा द्वारा गोविन्द से घर चलने का आग्रह ), ५.२३.१३( गोविन्द द्वारा महोदधि से द्वादश योजन भूमि की याचना तथा द्वारका पुरी के निर्माण का उल्लेख ), ५.२९.२० ( गोविन्द द्वारा प्राग्ज्योतिषपुर में नरकासुर सैन्य के सहस्रों दैत्यों के वध का उल्लेख ), स्कन्द २.२.३०.७८( गोविन्द से पूर्व दिशा की रक्षा की प्रार्थना ), ४.१.१९.११० ( अत्रि द्वारा ध्रुव को गोविन्द आराधना का निर्देश ), ४.२.६१.२२६ ( गोविन्द मूर्ति के लक्षण ), ४.२.८४.२४ ( गोपी - गोविन्द तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य ), ५.१.२७.११९ ( अवन्ती क्षेत्र में गोविन्द के लिए गज दान का उल्लेख ), ५.३.१०३.११३ (काष्ठ भार से गोविन्द नामक कृषक के पुत्र का मरण, कृमियों का उपद्रव, ऐरण्डी सङ्गम स्नान से मुक्ति का वर्णन ), ५.३.१४९.९ ( लिङ्गेश्वर तीर्थ में फाल्गुन द्वादशी को गोविन्द अर्चना का निर्देश ), ६.२१३.९० (गोविन्द से शिर की रक्षा की प्रार्थना ), लक्ष्मीनारायण १.२६५.९( गोविन्द की पत्नी चन्द्रा का उल्लेख ), २.२६१.३३ ( गोविन्द शब्द की निरुक्ति ), कथासरित् १.७.४२ ( गोविन्ददत्त : गोविन्ददत्त नामक ब्राह्मण के पुत्रों द्वारा किए गए आतिथ्य से वैश्वानर ब्राह्मण का क्रुद्ध होना, गोविन्ददत्त द्वारा वैश्वानर ब्राह्मण को सन्तुष्ट करना ), १.७.१०८ ( गोविन्ददत्त - पुत्र  सोमदत्त के माल्यवान् नामक शिवगण होने की कथा ) । govinda

Vedic view of Govinda

Comments on Govinda

 

गोविन्दकूट कथासरित् ५.२.२९३ ( अशोकवेग व विजयवेग नामक विद्याधरों का गोविन्दकूट नामक स्वस्थान गमन का उल्लेख ), १४.४.९७ ( नरवाहनदत्त के शत्रु गौरिमुण्ड के नगर गोविन्दकूट पर आक्रमण हेतु सैनिक - प्रयाण के आदेश का उल्लेख ) ।

 

गोविन्दस्वामी स्कन्द ३.१.८.४७ ( गालव ऋषि के शाप से सुदर्शन तथा सुकर्ण नामक विद्याधरों का गोविन्दस्वामी ब्राह्मण के विजयदत्त व अशोकदत्त नामक पुत्रों के रूप में जन्म, विजयदत्त को शापवश वेतालत्व की प्राप्ति ), ५.२.७४ ( गोविन्दस्वामी ब्राह्मण के कनिष्ठ पुत्र विजयदत्त के राक्षसराज कपालस्फोटक बनने की कथा ) । govindaswaamee /govindaswaami

 

गोशृङ्ग स्कन्द ७.१.२४.१७१, ७.१.५४.३ ( शिखण्डिगण के वचनानुसार गन्धर्वसेना का पिता के साथ कुष्ठ निवृत्ति हेतु गोशृङ्ग मुनि के आश्रम में गमन, गोशृङ्ग - निर्दिष्ट सोमवार व्रत तथा शिवाराधना से कुष्ठ से मुक्ति का वर्णन ) । goshringa

 

गोष्ठ लक्ष्मीनारायण २.२१५.२१ ( विगोष्ठ : श्रीहरि का विगोष्ठ नामक नगरी में आगमन, पूजन, भ्रमण, उपदेश, भोजन तथा रात्रि में विश्रामादि का वर्णन ); द्र. विगोष्ठिका । goshtha

 

गोष्पद भविष्य ४.१९ ( गोष्पद तृतीया व्रत के माहात्म्य का वर्णन ), स्कन्द ७.१.३३६ ( गोष्पद तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन, पृथु द्वारा गोष्पद में स्नान तथा श्राद्ध से पिता के पापों का क्षालन ), लक्ष्मीनारायण १.५४९.१० ( न्यङ्कुमती नदी के तट पर स्थित गोष्पद नाम तीर्थ में यज्ञ करके पृथु द्वारा वेन की मुक्ति की कथा ) । goshpada

 

गोसव ब्रह्म २.२१.९ ( गौ पर अत्याचार के कारण नन्दी द्वारा मर्त्य तथा स्वर्ग लोक से गौ का हरण, देवों की प्रार्थना पर नन्दी द्वारा गोसव यज्ञ करने का कथन, गोसव यज्ञ से मानुष तथा दिव्य गौ का वर्धन ), विष्णुधर्मोत्तर ३.१८.१ ( ४९ तानों में से एक ) । gosava

 

गौ अग्नि ६५.१५ ( गृह प्रवेश के समय गौ पूजा की विधि ), २१०.३० ( विभिन्न प्रकार की गौ दान की महिमा ), २१३( स्वर्ण निर्मित कामधेनु तथा कपिला गौ के दान का माहात्म्य ), २३२.२१ ( गौ द्वारा शुभाशुभ शकुन का ज्ञान ), २९२ ( गौ माहात्म्य तथा गौ - चिकित्सा / गवायुर्वेद ), ३०२.२९ ( गौ समुदाय के रक्षक मन्त्र का उल्लेख ), कूर्म १.७.५५ ( ब्रह्मा के उदर से गौ के प्राकट्य का उल्लेख ), १.१६.१०४ ( गौतम आश्रम में मायामयी कृष्णा गौ के मरण का उल्लेख ), २.२६.४५ ( गौ दान से बृ|ध्न विष्टप स्वर्ग प्राप्ति का उल्लेख ), गणेश १.३.४० ( पङ्क से गौ की रक्षा का निर्देश ), गर्ग २.१० ( कृष्ण द्वारा वृन्दावन में गौ चारण तथा गौ शोभा का वर्णन ), ३.९.२१ ( कृष्ण के मन से गौ के प्राकट्य का उल्लेख ), गरुड २.४२ ( गौ दान की महिमा ), गर्ग ३.९.२१( कृष्ण के मन से गायों व वृषभों के प्राकट्य का उल्लेख ), देवीभागवत ११.११.७ ( चतुर्वर्ण अनुसार गौ विभाग  ), नारद १.१२२.३३ ( भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी में करणीय गो त्रिरात्र व्रत की विधि व फल ), १.१२४.१३ ( आषाढ पूर्णिमा में करणीय गोपद्म व्रत की विधि तथा फल ), पद्म १.३.१०५ ( ब्रह्मा के उदर से गौ की सृष्टि का उल्लेख ), १.९.४३( पितर - कन्या, साध्यों की पत्नी सुकन्या बनना ?), १.१८.२४४ ( पुष्कर में स्नान कर मन्त्रपूत गो दान से मोक्षप्रद लोकों की प्राप्ति का उल्लेख ), १.४८.१२५ ( ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न तेज से गौ की उत्पत्ति, गौ - माहात्म्य, पूजा - विधि, कपिला आदि गोदान की विधि, दान फल का वर्णन ), ३.२६.४६ ( गौ भवन तीर्थ में अभिषेक से सहस्र गोदान फल प्राप्ति का उल्लेख ), ४.२३.१२ ( कार्तिक शुक्ल द्वादशी को गोमूत्र सेवन का निर्देश ), ४.२४.६ ( गोचर्म मात्रभूमि दान का महत्त्व तथा गोचर्म के परिमाण का कथन ), ५.३०.२२ ( जाबालि द्वारा ऋतम्भर राजा को सन्तान प्राप्ति हेतु गौ -पूजा तथा गो - माहात्म्य का कथन ), ६.६.२२ ( बल असुर के एक अङ्ग के गो नग पर गिरने का उल्लेख ), ६.१४४ ( गो ह्रद में स्नानादि का फल ), ६.१६३ ( गो तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य : गो तीर्थ में गायों द्वारा स्नान से शुक्लता प्राप्ति, मनुष्यों द्वारा स्नान से मातृ ऋण से मुक्ति ), ६.२०२+ ( दिलीप व सुदक्षिणा का पुत्र प्राप्ति हेतु वसिष्ठ आश्रम में गमन, वसिष्ठ द्वारा गो सेवा का उपदेश, गो सेवा से पुत्र प्राप्ति कारक वर प्राप्ति का वर्णन ), ६.६६.७० ( समुद्र मन्थन से ५ गायों की उत्पत्ति, नन्दिनी गौ की पूजा तथा अर्घ्य प्रदान विधि ), ब्रह्म २.५.५७ ( विनायक द्वारा प्रेरित करने पर पार्वती - सखी जया का गौ रूप धारण कर गौतम के आश्रम में गमन, मायामयी गौ का आश्रम में मरण, गौतम का दुःखी होना, उपाय रूप में महेश्वर के जटाजूट में स्थित जल से सिंचन की कथा ), २.२१ ( गौ पर अत्याचार के कारण नन्दी द्वारा मर्त्य लोक तथा स्वर्गलोक से गौ का हरण, देवों की प्रार्थना पर नन्दी द्वारा पुन: गौ का वर्धन ), २.६१.२६ ( दैत्यों द्वारा देव -गायों का हरण, विष्णु द्वारा बाण सन्धान पूर्वक दैत्यों का क्षय, गौ प्राप्ति स्थान की गो तीर्थ नाम से प्रसिद्धि ), ब्रह्मवैवर्त्त १.५.४४ ( कृष्ण के लोमकूपों से गौ की उत्पत्ति का उल्लेख ), २.२७.५५ ( गोदान के फल का कथन ), २.३०.१७२ ( गोहत्या पाप प्रापक कर्मों का वर्णन ), ४.२१.९३ ( कृष्ण द्वारा इन्द्र याग की अपेक्षा गौ के महत्त्व का कथन ), ब्रह्माण्ड  १.२.३६.१९८ ( गोरक्ष : पृथु से पूर्व सस्योत्पत्ति, गोरक्ष, कृषि आदि के अभाव का उल्लेख ), २.३.१.७७ ( सोमपा पितर - कन्या, शुक्र - पत्नी, शण्डार्क आदि की माता ), २.३.१३.१२९ ( गोगोष्ठ : श्राद्ध हेतु गोगोष्ठ की प्रशस्तता का उल्लेख ), २.३.२८.५७ ( कार्त्तवीर्य के मन्त्री चन्द्रगुप्त द्वारा जमदग्नि की गौ के हरण का परामर्श, जमदग्नि का वध तथा गौ हरण का वृत्तान्त ), २.३.७१.१०८( गान्दिनी कन्या द्वारा गर्भ से बाहर निकलने के लिए प्रतिदिन गौ दान की शर्त का कथन ), भविष्य १.१८७.४७ ( समुद्र मन्थन से नन्दा, सुभद्रा, सुरभी, सुमना तथा शोभनावती नामक ५ प्रकार की गायों की समुत्पत्ति, गौ का माहात्म्य ), २.३.२ ( गोचर भूमि के उत्सर्ग की महिमा ), २.३.१७ ( गोप्रचार प्रतिष्ठा विधि का वर्णन ), ३.४.२५.१९६ ( गौ के कर्म भूमि का प्रतीक होने का उल्लेख ), ४.१९ ( गोष्पद तृतीया व्रत के माहात्म्य का वर्णन ), ४.६९ ( गोवत्स द्वादशी व्रत के माहात्म्य का वर्णन ), ४.६९.२४ ( गौ में देव प्रतिष्ठा का वर्णन ), ४.९४.६३ ( अनन्त चर्तुदशी व्रत में गौ के निष्फल भूमि रूप होने का कथन ), ४.१४१.५४ ( शनि के लिए कृष्ण गौ के दान का उल्लेख ), ४.१५१+ ( गौ दान विधि का वर्णन, प्रत्यक्ष धेनु, तिल धेनु, जलधेनु, लवणधेनु, कांचन धेनु, रत्न धेनु, उभयमुखी धेनु दान का वर्णन ), ४.१५६.१६ ( गौ शरीर में देव विन्यास का कथन ), ४.१५९ ( सहस्र गौ प्रदान विधि का वर्णन ), ४.१६१ ( कपिला गौ दान के माहात्म्य का वर्णन ), भागवत ४.१७.१४ ( पृथु के क्रोध से डरकर पृथ्वी का गौ रूप धारण कर भागना, पृथु  व देव, पितर आदि अन्यान्य योनियों द्वारा गौ दोहन का वर्णन ), मत्स्य १३.५८ ( गोदान के समय सती देवी के नामों के पाठ से ब्रह्मपद प्राप्ति का उल्लेख ), १०.१२ ( भयभीत पृथ्वी का गो रूप धारण कर पलायन, गो रूपा पृथ्वी के दोहन का वृत्तान्त ), १५.१० ( शुक व पीवरी - कन्या कृत्वी का एक नाम, ब्रह्मदत्त -माता ),१५.१५ ( पितर - कन्या, शुक्र - पत्नी ), २७८ ( गो सहस्र दान विधि का वर्णन ), लिङ्ग १.१३.५ ( पीतवासा कल्प में ध्यानस्थ ब्रह्मा के समक्ष माहेश्वरी गौ के प्रकट होने का वर्णन ), १.१६.१९ ( ब्रह्मा द्वारा शिव से विश्वरूपा गौ के विषय में पृच्छा ), २.३८ ( गौ सहस्र दान विधि ), वराह १६.११ ( देवों द्वारा गोमेध यज्ञ का प्रारम्भ, दैत्यों द्वारा गोमेध की गायों का अपहरण, दैत्य - सेना के निहत होने पर गायों के मोचन का वर्णन ), ७१.२४ ( गौतम आश्रम में मायामयी गौ के मरण का प्रसंग ), १४७.२९ ( और्व शाप से सन्तप्त शम्भु के ताप की शान्ति हेतु सुरभि गौओं का अवतारण, गौ दुग्ध सिंचन से ताप की शान्ति ),  २०६.२९ ( गौ शरीर में देवों की स्थिति का कथन ), वायु २३.५( गौ रूपी रौद्र गायत्री की उत्पत्ति तथा स्वरूप का वर्णन ), २३.६४/१.२३.५९( श्वेत वर्णा गौ रूपी ब्रह्म गायत्री तथा लोहित वर्णा गौ रूपा गायत्री का कथन ), ५२.१२ ( शरद ऋतु में सूर्य रथ पर अधिष्ठित ऋषियों में से एक ), ७३.३६( कव्य पितरों की कन्या, शुक्र - पत्नी ), ९३.१४ ( गो : काकुत्स्थ - पुत्री, यति - पत्नी, चन्द्र वंश ), विष्णु १.५.४८ ( ब्रह्मा के उदर से गो की उत्पत्ति का उल्लेख ), ५.१.१४ ( सूर्य रश्मि का वाचक शब्द ), विष्णुधर्मोत्तर २.४२ ( गौ माहात्म्य का वर्णन ), २.४३ ( गौ चिकित्सा का वर्णन ), २.४४ ( गौ शान्ति कर्म का वर्णन ), ३.९९ ( प्रतिमा प्रतिष्ठा के अन्तर्गत पञ्चगव्य संस्कार का वर्णन ), ३.२९१( गौ माहात्म्य तथा शुश्रूषा का वर्णन ), ३.३०१.३१( गौ प्रतिग्रह की संक्षिप्त विधि ), ३.३०६ ( गौ दान के फल का निरूपण ), शिव ४.६ ( गौ व वत्स संवाद के अन्तर्गत वत्स के ताडन पर गौ को दुःख, प्रतिकार स्वरूप गौ द्वारा गृहस्वामी - पुत्र का ताडन, गृहस्वामी पुत्र - वध से प्राप्त कृष्णत्व के नर्मदा स्नान से निवारण का वर्णन ), ४.२५.२९ ( गणेश द्वारा गौ बनकर सस्य का भक्षण, गौतम ऋषि द्वारा गौ के निवारण पर मायामयी गौ के मरण का वृत्तान्त ), ७.२.३१.१८३ (शिव महास्तोत्र जप से गोहत्या रूप पाप से मुक्ति का उल्लेख ), स्कन्द १.२.४.७८( गौ के दान का उत्तम कोटि के दानों में वर्गीकरण ), २.४.३.४१ ( रुद्र शाप के कारण गायों द्वारा विश्व भक्षण का उल्लेख ), २.४.३.४१टीका ( विष्णु व ब्रह्मा की स्पर्धा में मिथ्या साक्षी से गौ के अपवित्र मुख होने का कथन ), २.४.४.८० ( गोरज से वायव्य स्नान का उल्लेख ), ४.१.२.७७ ( गौ माहात्म्य, शृङ्गाग्र में सर्वतीर्थ व खुराग्र में सर्व पर्वतों की स्थिति का कथन ), ४.२.८३.७१ ( गोव्याघ्रेश्वर तीर्थ की महिमा का उल्लेख ), ४.२.८४.३६ ( गोप्रतारेश्वर तीर्थ की महिमा का उल्लेख ), ४.२.९७.९ ( गोप्रेक्ष लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ), ५.३.१९.५ ( प्रलय के पश्चात् एकार्णव में गौ द्वारा मार्कण्डेय ऋषि की रक्षा का वर्णन ), ५.३.३९.२८ ( गौ के शरीर में देवों की स्थिति का कथन ), ५.३.५१.५६ ( गर्भ मोचन से पूर्व गौ के पृथिवी रूप होने का कथन ), ५.३.५६.१२० ( गो दान से त्रिविष्टप की प्राप्ति का उल्लेख ), ५.३.८३.१०३ ( गोदान महिमा तथा गौ के अङ्गों में देवों की स्थिति का वर्णन ), ५.३.१८१.१६ (गायों के दूर प्रचरण से नष्ट होने का उल्लेख ), ६.१४ ( अज्ञान भाव से की गई चमत्कारपुर की प्रदक्षिणा से गौ तथा गौरक्षक के जन्मान्तर में मन्त्री व राजा बनने तथा मुक्त होने का वृत्तान्त ), ६.१५२.२५ ( अर्जुन द्वारा तस्करों द्वारा अपहृत गायों को मुक्त कराने का उल्लेख ), ६.१८१.६६ ( ब्रह्मा के यज्ञ हेतु लाई गई गोपकन्या का गोमुख से प्रवेश व गो गुह्य से आकर्षण द्वारा पवित्रीकरण का कथन ), ६.२५९.४० ( गोलोक के गौ - समूह के नाम का कथन ), ७.१.३२.४४ ( दधीचि के त्यक्त कलेवर को मांसादि से मुक्त करने हेतु देवों द्वारा गोलोक से गौओं का आवाहन, नन्दा, सुभद्रा प्रभृति पांच गोमाताओं द्वारा कलेवर की शुद्धि का कथन ), ७.१.३३८.४१ ( आपस्तम्ब प्रोक्त गौ महिमा का वर्णन ), ७.३.२९ ( राजा सुप्रभ द्वारा मृगी का वध, मृगी द्वारा राजा को व्याघ्र बनने का शाप, कपिला गौ से वार्तालाप पर शाप से मुक्ति का वृत्तान्त ), हरिवंश १.१८.५८ ( सुकाल नामक पितरों की मानसी कन्या एकशृङ्गा के स्वर्ग में गौ नाम से विख्यात होने का उल्लेख ), १.५५.२१ ( कश्यप का यज्ञावसर पर वरुण से उनकी पयोदा गौएं मांगना, यज्ञ समाप्ति पर भी कश्यप के गौ पर बलाधिकार का कथन ), २.१२७.४८ (बाणासुर की गायों के दुग्धपान से वृद्धत्व के नाश तथा अजरता प्राप्ति का उल्लेख ; कृष्ण द्वारा बाणासुर की दिव्य गायों को प्राप्त करने के उद्योग में असफलता ), २.१४७.४४( सत्यभामा की कामना पूर्ति हेतु कृष्ण द्वारा बाणासुर की दिव्य गायों की प्राप्ति का प्रयत्न, वरुण की प्रतिज्ञा के कारण प्रयत्न का त्याग ), महाभारत वन २००.६९(द्विमुखी गौ की कल्पना), २००.२८(सूर्य - सुता होने का उल्लेख), द्रोण ९३.४३, कर्ण ३८.१०, ४२.४५, अनुशासन ५०, ६६, ६९, ७८, १०२.४४, १२६,  आश्वमेधिक २१.२२( गौ रूपी दिव्य व अदिव्य वाक् का प्रतिपादन ), वा.रामायण ७.२३.२१ ( वरुणालय में प्रवेश करने पर रावण द्वारा सुरभि गौ के दर्शन का उल्लेख ), ७.२३.२८ ( रावण - आगमन का समाचार सुनकर वरुण के पुत्र - पौत्रों के साथ गौ तथा पुष्कर नामक सेनाध्यक्षों के भी आने का उल्लेख  ), कथासरित् ६.१.१११ ( दुर्भिक्ष से क्षुधित सात ब्राह्मण शिष्यों द्वारा गाय को मारकर क्षुधा शान्त करने की कथा ), १०.५.४४ ( मूर्ख गौदोहक द्वारा एक साथ बहुत सा दुग्ध प्राप्त करने की इच्छा से गोदोहन त्याग की कथा ), लक्ष्मीनारायण १.३२.६ ( गो महिमा का वर्णन ), १.२२२ ( राजा नृग द्वारा गौतम नामक विप्र को गौ का दान, गौ का पलायन कर पुन: राजा के गौगोष्ठ में गमन, राजा द्वारा पुन: उसी गौ को सोमशर्मा को दान, गौदान विपर्यास से विप्र शाप वश राजा को कृकलास योनि की प्राप्ति का वर्णन ), १.३६५.२९ ( मेरु पर गौ रक्षार्थ देवशुनी सरमा की नियुक्ति, असुरों द्वारा गौ का हरण, सरमा के पातिव्रत्य प्रभाव से दैत्यों का भस्मीभूत होना तथा गौ रक्षण का वृत्तान्त ), २.८.११ ( बाल कृष्ण द्वारा मङ्गला गौरी नामक कामधेनु का दुग्धपान, दिव्य गायों द्वारा कृष्ण को दुग्ध पिलाने हेतु प्रार्थना, कृष्ण द्वारा कोटि स्वरूप धारणकर कोटि गायों का दुग्ध - पान, राक्षस - पत्नियों का भी गौ रूप धारण कर कृष्ण को दुग्ध - पान, कृष्ण द्वारा दुग्ध के साथ -साथ प्राणों का भी पान, पुन: राक्षसियों के प्राणदान हेतु प्रार्थना करने पर कृष्ण द्वारा मुक्ति प्रदान करने का वर्णन ), २.१५.२६ ( गौ के अङ्गों में देवादि की स्थिति ), २.७७.३५ ( गोदान से राजा के पापों का नाश परन्तु गो गृहीता के पापयुक्त होने का उल्लेख ), ३.१८.१० ( गौदान के धन दान से ऊपर व कन्या दान से निम्नतर होने का उल्लेख ), ३.१०१ ( गोदान से प्रेत का उद्धार, गो माहात्म्य का वर्णन ), ३.१०२.२४( गायों द्वारा चञ्चला लक्ष्मी को शकृत में स्थान देने का वृत्तान्त ), ३.११२.४ ( गो धेनु दान हेतु पात्रता अपात्रता विचार, गो के अभाव में घृत धेनु आदि का दान, गोदान के माहात्म्य का वर्णन ), ३.१२७.५८ ( गोसहस्र महादान विधि का निरूपण ), ४.४५.३१ ( नारायण सरोवर के तट पर श्वेत लोहिता नामक दिव्या गौ का आगमन, गौ के प्रार्थना करने पर कृष्ण द्वारा सरस्वती धेनु सारस्वत तीर्थ के रूप में स्थापना का कथन ), ४.६७.१ ( गोवार नामक गोपालक द्वारा गौ दुग्ध की चोरी से मार्जार बनना, कृष्ण - प्रसाद - भोजन से गोवार की मुक्ति की कथा ), ४.९०.५ ( सर्वधर्मादि वर्जित गृहस्थ के लिए गोदान रूप मोक्ष साधन का वर्णन ), सामरहस्योपनिषद २७५पृ. ( गायों के २ भेदों संसिद्धा व साधनसिद्धा; व्रजमण्डल में संसिद्धा ) ।gau/cow

Remarks by Dr. Fatah Singh

 

गौ चित्तवृत्तियों को गायों के रूप में कल्पित किया गया है । वे गाएं ज्ञान का उदक पीती हैं, क्रिया रूपी घास चरती हैं, भावना रूपी दूध देती हैं। अथवा, आत्मा परमात्मा से बंधने पर जो ज्ञान की शक्ति प्राप्त करता है , वह गौ है ।- फतहसिंह

 

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